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शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

खुद बन बैठे ‘सरकार’ :भाप्रसे अधिकारी रमेश एस थेटे के कारनामे

रवि अवस्थी,भोपाल। राज्य सरकार पर एक दलित अधिकारी को दबाने व प्रताड़ित करने  का आरोप लगाने वाले वर्ष 1993 बैच के भाप्रसे अधिकारी रमेश एस थेटे के कारनामे भी कम नहीं हैं।
 उज्जैन संभाग में बीते साल अपर आयुक्त रहते हुए उन्होंने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर करीब 40 करोड रुपए मूल्य की शासकीय जमीन निजी हाथों में सौंप दी।
 यही नहीं उन्होंने सरकार के आदेशों के विपरीत वर्ग विशेष के कुछ कर्मचारियों को लीक से हट कर बेजा फायदा पहुंचाने की भी कोशिश की ।
उज्जैन जिले के ग्राम मालनवासा निवासी गीताबाई की करीब एक एकड Þजमीन पर अपने मालिकाना हक का दावा राज्य सरकार ने करीब छह साल पहले ही निरस्त कर दिया था। यही नहीं उनकी यह कथित भूमि पांच साल पहले उज्जैन विकास प्राधिकरण को सौंप दी गई। इस पर मेपकास्ट ने देश का प्रसिद्ध तारामंडल भी स्थापित कर दिया। देश के तत्कालीन राष्टÑपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने यह सौगात आम जन को लोकार्पित भी कर दी,लेकिन बीते साल इस संभाग के अपर आयुक्त बने रमेश थेटे ने शासनादेश को नजर अंदाज कर संबंधित जमीन का मालिकाना हक गीताबाई को दे डाला। वह भी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर। केवल इसलिए,क्योंकि गीताबाई एक वर्ग विशेष से हैं। उज्जैन विकास प्राधिकरण को जब अपर आयुक्त के इस आदेश की भनक लगी तो उसने हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ की शरण ली। तब कहीं  न्यायालय ने बीते साल मई में तत्कालीन  अपर आयुक्त के आदेश पर स्टे दिया। ऐसे एक नहीं करीब 25 मामले हैं। इनमें थेटे ने अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर करीब चालीस करोड़ रुपए कीमत की जमीन बांट दी और सभी मामलों में सरकार के पूर्व आदेशों को नजर अंदाज किया। यही नहीं अपर आयुक्त ने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे संभाग के कुछ दलित अधिकारी,कर्मचारियों को नियम विरुद्ध फायदा   पहुंचाने की कोशिश की। उनके इन कारनामों को देखा जाए तो यह अहसास होता है, कि जैसे वह खुद सरकार बनने की कोशिश करते रहे।
अन्य मामलों का खुलासा करने  से पहले यह जानना आवश्यक है,कि श्री थेटे ने उज्जैन का अपर आयुक्त रहते हुए जो आदेश जारी किए,क्या उन्हें इनका अधिकार था? सरकार के मौजूदा नियमों व इस मामले के जांच अधिकारी उज्जैन संभागायुक्त की रिपोर्ट के मुताबिक तो कतई नहीं। दरअसल,वर्ष 1995 में केंद्र सरकार के एक आदेश के बाद मप्र सरकार ने संभागीय अपर आयुक्त के अपीलीय अधिकार समाप्त कर दिए थे। यानी, अपर आयुक्त रहे थेटे को राजस्व मामलों में सुनवाई और फैसला देने के कोई अधिकार नहीं थे। दूसरी बात,नगर भूमि निरसन अधिनियम -1999 को संशोधित कर उज्जैन नगर निगम सीमा अंतर्गत आने वाले राजस्व मुआवजा प्रकरणों के लिए एक ट्रिब्युनल गठित किया गया और यह तय हुआ था,कि विवादित राजस्व मामलों की अपील इस ट्रिब्युनल में पूर्व फैसला आने के  बाद तीस दिवस में ही की जा सकेगी।  ट्रिब्युनल में अपील सुनने का अधिकार भी संभागायुक्त स्तर के अधिकारी को ही है। हुआ यह,कि थेटे ने खुद को मंडल आयुक्त दर्शाते हुए 32 साल पुराने विवादित मामलों की सुनवाई स्वयं शुरू कर दी  और एक ही दिन में 4 से 5 मामलों की सुनवाई कर फैसले भी सुना डाले। जबकि इन प्रकरणों को राज्य शासन पहले ही खारिज कर चुकी थी।
 और बानगी जानिए,उज्जैन संभाग के ही ग्राम पवासा निवासी विक्रम सिंह पिता किशन  सिंह,पांडयाखेड़ी निवासी कुंवरजी माली व उज्जैन निवासी मोहनलाल पिता हरिराम की जमीन प्रकरणों को 25 से 30 साल पहले ही निरस्त कर नस्तीबद्ध कर दिया था। अपर आयुक्त थेटे ने गए साल 14 मार्च को इन प्रकरणों में पुन: सुनवाई की और एक ही दिन में फैसला सुनाते हुए करीब तीन करोड़ रुपए कीमत की भूमि अपीलार्थियों के नाम करने के आदेश दे दिए। एक मामले में तो श्री थेटे ने न्यायालय के आदेश को नजरअंदाज कर फैसला सुनाया। जानकार सूत्रों के अनुसार, उज्जैन निवासी महेश जोशी एवं अन्य (प्रकरण क्रमांक 332/2011-12)क ी 1.174 हे. भूमि के मामले में राज्य शासन ने तो इस प्रकरण को खारिज किया ही उच्च न्यायालय ने भी फरियादी की याचिका खारिज कर दिया था। यह बात जानते हुए भी तत्कालीन अपर आयुक्त ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर करीब 84 लाख मूल्य की उक्त भूमि का फैसला फरियादी के पक्ष में कर डाला। ऐसा ही फैसला प्रकरण क्रमांक289/2012-13 यानि हिम्मत सिंह विरुद्ध मप्र शासन के प्रकरण में भी सुनाया गया। खास बात यह,कि इस प्रकरण में सुनवाई की जानकारी मिलने पर संभागीय आयुक्त ने प्रकरण को तत्काल प्रभाव से अपने कार्यालय में स्थानांतरित करने के आदेश दिए थे।  इस मामले में श्री थेटे ने एक दिन बाद अगली सुनवाई की तिथि तय की थी ,लेकिन कमिश्नर का उक्त आदेश पाते ही उन्होंने तत्काल इस फैसले में सुनवाई पूरी की और याचिकाकर्ता के पक्ष में फै सला सुना डाला। कुछ अन्य मामलों में भी इसी तरह शासन व वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को नजरअंदाज कर मनमाने तरीके से कार्रवाई करते हुए निर्णय लिए गए। कुछ मामलों में तो दूसरे पक्ष के लोगो व उनके  अधिवक्ताओं का पक्ष जानने तक का अवसर नहीं दिया गया। इस तरह करीब 40 करोड़ 38 लाख 47 हजार रुपए मूल्य की 45.302 हेक्टेयर शासकीय भूमि का निजीकरण कर दिया गया।
 सजायाफ्ता को कर दिया ‘बहाल’
 थेटे ने राजस्व मामलों में ही नहीं प्रशासनिक मामलों में भी मनमानी की। खासकर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे या सजायाफ्ता कर्मचारियों को भी संरक्षित किया। मसलन, उज्जैन कलेक्टर ने हल्का पटवारी आदर्श जामगड़े को शासकीय कार्य में गंभीर लापरवाही व उदासीनता बरतने के आरोप में गए साल 4 फरवरी को निलंबित कर दिया था। इस आदेश के विरुद्ध जामगड़े को मप्र सिविल सेवा नियम 1966 के तहत संभागायुक्त के समक्ष अपील करने का अधिकार था,लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और  भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 44 के तहत अपर आयुक्त श्री थेटे के समक्ष याचिका दायर की। विद्वान अपर आयुक्त ने भी इस याचिका को न केवल स्वीकार किया बल्कि कलेक्टर के निलंबन संबंधी आदेश को स्थगित कर दिया। इनकी ‘विद्वता’ की एक और बानगी जानिए ,जनपद पंचायत उज्जैन अंर्तगत आने वाली नौगांवा ग्राम पंचायत क ी सचिव कु.कविता जाट ने 3900 रुपए के एक चेक में 30900 रुपए की राशि अंकित कर भुगतान हॉसिल कर लिया। मामला पकड़ में आने पर कविता के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ और न्यायालय ने उसे तीन साल की सजा सुना दी। जिला कलेक्टर ने नियमानुसार कविता को निलंबित कर दिया। अपर आयुक्त ने इस मामले की भी सुनवाई की और कविता के निलंबन आदेश को स्थगित कर दिया। उनके इस फैसले के बाद यह सजायाफ्ता सचिव पुन: सेवा में आ गई। यही नहीं श्री थेटे ने संभाग के अनेक पटवारियों के मूल निवास के पते में भी परिवर्तन करने की नियम विरुद्ध अनुमति दे डाली,ताकि भविष्य में वे अपने गृह नगर या गृह ग्राम में भी पदस्थापनाएं पा सकें।
 इन मामलों के संज्ञान में आते ही राज्य शासन ने न केवल संबंधित फैसलों को निरस्त किया बल्कि संभागीय आयुक्त को इस मामले की जांच सौंपी गई। संभागीय आयुक्त ने अपनी जांच रिपोर्ट में उक्त तथ्यों को वर्णित करते हुए लिखा है,कि तत्कालीन अपर आयुक्त रमेश एस थेटे ने उक्त प्रकरणों में व्यक्ति विशेष को अनाधिकृत लाभ पहुंचाने क ी दृष्टि से विधि विरुद्ध तथा क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर दुर्भावनापूर्वक कार्रवाई की गई। इससे शासन को करीब 40 करोड़ 38 लाख 47 हजार रुपए की क्षति हुई।
 कलेक्टर,कमिश्नर को भी धमकाया
 जांच अधिकारी संभागायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है,कि उक्त अनियमित आदेश जिला क लेक्टर के संज्ञान में आने पर उन्होंने गत 22 मार्च 2013 को जमीनों का नामांतरण होने से रोक दिया। इस पर तत्कालीन अपर आयुक्त ने जिला कलेक्टर को पत्र लिखा। इसमें अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया गया। संभागायुक्त ने कहा,कि जब उन्होंने अर्धशासकीय पत्र के माध्यम से इन घटनाक्रमों की सूचना तत्कालीन मुख्य सचिव को दी तो श्री थेटे ने मुझे भी दिनांक 29 अप्रेल 2013 को पत्र लिखा। इसमें अशोभनीय भाषा का उपयोग करते हुए तथ्यहीन एवं व्यक्तिगत आक्षेप लगाए। यही नहीं श्री थेटे ने समाचार पत्रों में अनर्गल बयानबाजी करके दलित-सवर्ण का मुद्दा बनाया।
मैं अपनी जगह सही हूं: थेटे
 बताया जाता है,कि संभागीय कमिशनर की इसी रिपोर्ट पर राज्य शासन ने श्री थेटे से जवाब-तलब किया तो वह सरकार  के खिलाफ ही अनर्गल बयानबाजी पर उतर आए। एक समाचार पत्र से की गई बातचीत में उन्होंने यह तक कह डाला,कि मुख्यमंत्री कोई राजा नहीं हैं। वह सरकार पर एक दलित अधिकारी को धमकाने का आरोप भी लगा रहे हैं। इस बारे में श्री थेटे ने कहा,कि नगर भूमि निरसन अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट की जो गाइड लाइन है,उसके मुताबिक मुझे उक्त प्रकरणों में सुनवाई करने का पूरा अधिकार था।   हाईकोर्ट ने भी हाल ही में एक प्रकरण में त्रुटिपूर्ण न्यायालयीन फैसलों को अपराध की श्रेणी में नहीं माना है। उन्होंने कहा,कि संभागायुक्त की उक्त रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने उनसे जबाव मांगा है। मैं इस मामले में अपना पक्ष रख चुका हूं।  थेटे द्वारा नियम विरुद्ध निराकृत किए गए प्रकरण
 पक्षकार का नाम     अपील का समय     सुनवाई की          जमीन का क्षेत्रफल   कीमत लगभग
 हीरालाल ,सरदारपुरा      30 दिन में    27 साल 4 माह बाद    1.522 हेक्टेयर     2.96 करोड़
 गीता बाई मालनवासा     30 दिन में    06 साल 9माह बाद     2.638 हे.        2.96 करोड़
 दयाराम गोयलाखुर्द       30 दिन में    24 साल 6 माह बाद    0.197 हे.        0.35  करोड़
  रमेश मालीपुरा         30 दिन में    28 साल 7 माह बाद    0.699 हे.        0.72 क रोड़
 हेमराज पिता रामकिशन    30 दिन  में   28 साल 9 माह बाद   1.526 हे.        2.50 करोड़
 कैलाश मालीपुरा         30 दिन में    12 साल 8 माह बाद   0.699 हे.        0.72 करोड़
 परेशराम निमनवासा    30 दिन में    24 साल5 माह बाद    4.511  हे.       2.35 करोड़
 गीताबाई पत्नि जगन्नाथ  30 दिन में    12 साल 9 माह बाद    0.365 हे.        0.45 करोड़
 बद्रीलाल उज्जैन       30 दिन में    30 साल 6 माह बाद    3.797 हे.       2.00  करोड़
 बंशीराम पिता फूलचंद   30 दिन में     28 साल 11 माह बाद      हे.          2.26 करोड़
 कमलाबाई,जैथल       30 दिन में    30 साल 13 दिन बाद   0.156 हे.       0.16 करोड़
 औंकारलाल ,मालनवासा   30 दिन में    28 साल 5 माह बाद    0.125 हे.      0.23 करोड़
 विक्रम सिंह,पवासा      30 दिन में    11 साल 7 माह बाद    2.526 हे.      1.40 करोड़
 पूनम,मोचीवाड़ा       30 दिन में     12 साल 7 माह बाद   2.543 हे.        1.41 करोड़
 रामचंद्र,तेलीवाड़ा      30 दिन में     21 साल 5 माह बाद   0.626 हे.        0.66 करोड़
 प्रभाकरराव, सिंधी कालोनी30 दिन में    12 साल 6 माह बाद   1.571 हे.        1.07 करोड़
 मांगीलाल,नानाखेड़ा     30 दिन में    10 साल 17 दिन बाद  0.966 हे.        1.47 करोड़
 मोहनलाल ,उज्जैन     30 दिन में    9 साल 11 माह बाद   1.787 हे.        1.07 करोड़
 कुंवरजी पांडयाखेड़ा      30 दिन में    11 साल 7 दिन बाद   0.400 हे.        0.54 करोड़
 रामचंद्र जोशी         30 दिन में    28 साल 7 माह  बाद  1.174 हे.        0.83 करोड़
 सुहासिनी मुंदे        30 दिन में    19 साल 25 दिन बाद   0.749 हे.        0.58 करोड़
पन्नालाल            30 दिन में   33 साल 9 माह बाद    0.642 हे.         0.73 करोड़
जैनाबाई,धतरावदा      30 दिन में   23 साल  बाद         2.155 हे.         3.83 करोड़
 नारायण नलियाबाखल  30 दिन में    12 साल 11 माह बाद   3.232 हे.        6.29  करोड़
 हिम्मतसिंह,पवासा    30 दिन में     32 साल 3 माह बाद   5.438 हे.        2.86 करोड़
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योग - 25 प्रकरण                                   45.302 हे.                          40.38  करोड़
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