भोपाल। करीब 9 साल पहले पन्ना राष्टीय अभ्यारण्य को सरस्किा बनाने की बदनामी झेल चुका मप्र बाघों के संरक्षण को लेकर अब भी संजीदा नहीं है। इसके चलते यह सूबा बाघों की कब्रगाह बन चुका है। खास बात यह है,कि प्रदेश में बीत सात सालों के दौरान ही बाघों के संरक्षण के नाम पर करीब एक हजार करोड रुपए खर्च किए गए,लेकिन बीते सात सालों में मारे गए बाघों की संख्या डेढ सौ का आंकडा पार कर चुकी है। शनिवार को ही शहडोल जिले में एक और बाघ की करंट लगने से मौत हो गई।
मध्यप्रदेश कभी टाइगर स्टेट के नाम से पहचाना जाना जाता था। तीन साल पहले उससे यह दर्जा छिन गया। बावजूद राज्य में बाघों के संरक्षण को लेकर संजीदगी नजर नहीं आती। यह स्थिति तब है जबकि बाघ संरक्षण के नाम पर हर साल करोडों रुपए खर्च हो रहे हैं।
बाघ की मौत का ताजा मामला शनिवार को शहडोल जिले की जयसिंहनगर वन परिक्षेत्र का है। यहां एक बाघ खेत की बागड में मृत पाया गया। माना जा रहा है कि कि इसकी मौत बागड में छोडे गए करंट से हुई।
बीते माह भी 4 बाघ व एक तेंदुए का शिकार
बीते माह भी शहडोल के घुनघुटी वन परिक्षेत्र (कांचोदर बीट) में बाघ शावक का शव मिला था। इससे पहले भी बीते एक पखवाडे के दौरान वहां 4 बाघ व एक तेंदुए की संदिग्ध परिस्थितियों में मौतें हो चुकी
2 दिन पहले कटनी में एक बाघ की मौत
दो दिन पहले ही कटनी जिले के बड़वारा वनपरिक्षेत्र में गोपालपुर.बनहरी गांव के पास एक बाघ का शव मिला। इसका शव वन परिक्षेत्र में तारों में फंसा मिला था।
देश में पहले स्थान पर
बाघों की मौत के मामले में मध्य प्रदेश लगातार दूसरे साल देश में पहले स्थान पर है। यहां बीते साल 19 जनवरी से दिसंबर 2017 तक 25 बाघों की हुईं। जबकि इस अवधि में महाराष्ट्र में 17 और वर्ष 2014 में टाइगर स्टेट का दर्जा पा चुके कर्नाटक में 14 बाघ मरे हैं। ये खुलासा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ;एनटीसीएद्ध की रिपोर्ट से हुआ । वर्ष 2016 में प्रदेश में जनवरी से दिसंबर तक 31 बाघों की मौत हुई थी। जबकि कर्नाटक में 15 बाघ मरे थे।
1050 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च
मध्यप्रदेश में पिछले 7 सालों में बाघों की सुरक्षाए मैनेजमेंट और टाइगर रिजर्वए अभयारण्यों से गांवों की शिफ्टिंग पर 1050 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैंए लेकिन बाघों की मौत का ग्राफ कर्नाटक की तुलना में कम नहीं हो रहा है। इसके लिए वन्यप्राणी विशेषज्ञ कर्नाटक सरकार के बाघ प्रबंधन को बेहतर मानते हैं।
उनका कहना है कि मप्र में मैदानी और मुख्यालय स्तर से प्रबंधन में काफी कमियां हैं। जिस कारण ज्यादा बाघों की मौत हो रही है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने देशभर में बाघों की गिनती कराई थी। जिसमें देश में सबसे ज्यादा 406 बाघ कर्नाटक और 308 मप्र में पाए गए।
संरक्षित क्षेत्रों में सबसे ज्यादा मौत
इस बार भी सबसे ज्यादा बाघों की मौत संरक्षित क्षेत्र टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क और अभयारण्य में हुई है। हाल ही में शहडोल वन वृत्त की तीन घटनाएं सामने आई हैं। जिनमें दो बाघ और एक तेंदुए का शिकार महज 10 दिन के अंतराल में हुआ है। इनमें से एक बाघ की मौत करंट और दूसरे की जहर से होना बताया जा रहा है। पिछले साल भी संरक्षित क्षेत्र के अंदर जहर और करंट से बाघों की मौत के मामले सामने आए थे। इनमें से एक मामले में वन विभाग का कर्मचारी भी शामिल था।
किस साल कितनी मौत बाघ प्रबंधन पर खर्च राशि
2010 .. 14 241 करोड़
2011 .. 09 176 करोड़
2012 .. 13 098 करोड़
2013 .. 11 156 करोड़
2014 .. 35 166 करोड़
2015-- 11 086 करोड़
2016 .. 31 127 करोड़
2017 .. 25 योग .. 1050 करोड़
2018-- 02 ----
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वर्ष 2017 में किस प्रदेश में कितने बाघ मरे
प्रदेश .. 2014 की गिनती .. 2017 में मौत
मध्य प्रदेश.. 308 23
महाराष्ट्र .. 190 17
उत्तराखंड.. 340 15
कर्नाटक .. 406 14
उत्तर प्रदेश .. 117 07
असम .. 167 07
तमिलनाडू.. 229 03
केरल .. 136 02
ओडिसा .. 028 01
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