भोपाल .झूठ और फरेब की राजनीति ने मंदसौर के आधा दर्जन किसानों की जान ले ली व व इन्हें हिंसा पर उतरने को मजबूर किया । झूठ किसानों के हितैषी होने का और फरेब बीमा कंपनियों व उद्योगों को लाभ पहुंचाने किसानों को हॉसिए पर रखने का। मारे गए व घायल किसान इसी का विरोध कर रहे थे।
प्रदेश सरकार स्वयं को किसान हितैषी कहती है,लेकिन बीते साल ही उसने उद्योगों के लिए जमीन जबरिया अधिग्रहण करने एक कानून बना कर मुआवजे की धारा 34 को विलोपित कर दिया। यही नहीं संबंधित किसान का इस मामले में कोर्ट जाने का अधिकार भी छीन लिया गया। राज्य सरकार किसान को उसकी उपज की लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने का वादा कर सत्ता में आई,लेकिन चार साल गुजरने के बाद भी यह वादा पूरा नहीं हुआ। यही नहीं फसल बीमा राशि के वितरण में भी समय-समय पर कोताही हुई। इस मामले में भी किसानों को ठगने का प्रयास हुआ।
मसलन,फसल बीमा के नाम पर निजी बीमा कंपनियां बतौर प्रीमियम किसानों से जो धन वसूल रही है वह मुआवजे के तौर पर बांटे जाने वाली रकम से कई गुना अधिक है। केंद्र में सत्ता हॉसिल करने से पहले सत्तारुढ़ दल भाजपा ने किसानों से वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वह स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू करेगी। इसमें किसानों को उनकी उपज क ी लागत का डेढ़ गुना दाम देने की बात कही गई,लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार को तीन साल होने के बाद भी इसे लागू नहीं किया गया। उत्तरप्रदेश में सरकार सत्ता में आने के लिए किसानों का कर्ज माफ कर देती है,लेकिन लंबे अरसे से प्राकृतिक आपदा की मार झेलते रहे महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश के किसानों को इस मामले में बिसरा दिया गया।
कुछ इसी तरह के छलावे प्रदेश सरकार भी करती रही। मसलन,बीते साल उसने प्याज को लेकर हुए आंदोलन के बाद इसके संग्रहण के लिए आधुनिक किस्म के भंडारगृह बनवाने का एलान किया था,लेकिन साल भर गुजरने के बाद प्रदेश में एक भी इस तरह का भंडारगृह नहीं बनाया जा सका। ज्ञात हो कि बीते साल ही प्रदेश सरकार द्वारा खरीदी गई करीब 67 करोड़ कीमत की दस लाख क्विंटल प्याज सड़ गई थी। इसके रखरखाव व बाद में फेंकने पर सरकार को करीब दस करोड़ रुपए और व्यय करने पड़े थे।
उपज का भुगतान समय पर नहीं
इसी रबी सीजन की बात की जाए जो प्रदेश सरकार ने बीते माह गेहूं की खरीदी तो बीते माह शुरु कर दी,लेकिन किसानों को इसका भुगतान पाने बैंकों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। पिछले पखवाड़े में आयोजित एक समीक्षा बैठक में स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बैंकों की इस स्थिति पर च्ािंता जताई,लेकिन फौरी तौर पर कोई वैकल्किप व्यवस्था नहीं की गई। किसान आंदोलन जोर पकड़ने पर चौथे दिन सरकार जागी और उसने आठ रुपए किलो क ी दर से प्याज खरीदने के साथ ही खरीदे जा रहे गेहूं का आधा भुगतान नकद करने की घोषणा भी की ,लेकिन उन किसानों के बारे में कुछ नहीं कहा गया,जो बीते एक माह से चेक लिए घूम रहे हैं।
कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने मंगलवार को ही अनौपचारिक चर्चा में कहा गया कि केंद्र सरकार से गेहूं उपार्जन के लिए हाल ही में एक हजार करोड़ रुपए प्राप्त हुए हैं और यह रकम बैंकों को दी जा रही है। इसके बाद किसानों को भुगतान के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। इससे किसानों की समस्या के प्रति सरकार की गंभीरता का आंकलन किया जा सकता है।
दलहन खरीदी को लेकर भी संशय
राज्य सरकार ने दो दिन पहले ग्रीष्मकालीन मूंग व अरहर भी समर्थन मूल्य पर खरीदने की बात कही। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ग्रीष्मकालीन मूंग की खरीदी नहीं करती। फलस्वरूप इसका समर्थन मूल्य भी केंद्र द्वारा तय नहीं किया जाता। केवल खरीफ की मूंग के लिए केंद्र की ओर से मूंग का समर्थन मूल्य 5 हजार 225 रुपए प्रति क्विंटल तय है। अब सरकार यदि स्वघोषित समर्थन मूल्य पर भी इसकी खरीदी करती है तो इसके लिए उसे केंद्र सरकार से अनुमति लेनी होगी। बताया जाता है कि गर्मी की मूंग खरीदने के लिए कृषि विभाग ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा है,लेकिन इसकी मंजूरी मिलने तक यह मामला फिलहाल खटाई में ही माना जा रहा है। दरअसल, यह खरीदी नेशनल एग्रीकल्चर को-आॅपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन आॅफ इंडिया (नाफेड) या भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) कर सकता है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि अपने स्तर से तैयारी कर ली जाए। इस तरह किसान ही नहीं संबंधित अधिकारी भी पसोपेस में हैं।
सहकारी बैंकों के रवैए से भी किसान नाराज
किसानों के गुस्से की एक प्रमुख बजह प्रदेश के सहकारी बैंकों का रवैया भी है। यह बैंक गेंहू या दीगर फसलों के उपार्जन का भुगतान करने से पहले संबंधित किसान को दिया गया कर्ज भी उक्त रकम से कटौती कर वसूल रहे हैं। इस भय से किसान इन समितियों को गेहूं बेचने की बजाए निजी व्यापारियों को माल दे रहे हैं। इस समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को कर्जदार किसान के लिए ऐच्छिक करवाने के लिए प्रयासरत है,लेकिन इसके लिए कें द्र सरकार की अनुमति आवश्यक है।
योजना ऐच्छिक बनाने केंद्र से सहमति लेनी पड़ सकती है। दरअसल,प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना केंद्र की है, इसलिए इसमें बदलाव करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़ सकती है। योजना में अभी बैंक से फसल के लिए कर्ज लेने वाले किसानों का बीमा करना अनिवार्य है। इसके पीछे मंशा कर्ज को सुरक्षित करना है। यही वजह है कि जब भी फसल बीमा की राशि किसानों को मिलती है तो सबसे पहले बैंक इससे अपना कर्ज वसूल करता है। ऐच्छिक करने पर बैंक के पास कर्ज की वापसी का एक विकल्प छिन जाएगा।
प्याज भंडारण को लेकर भी असमंजस
किसान आंदोलन के जोर पकड़ने पर राज्य सरकार ने प्रदेश के 22 जिलों में प्याज खरीदी की घोषणा की,लेकिन इससे पहले इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई। बीते साल भी किसानों क ा आक्रोश उजागर होने के बाद प्याज खरीदी की थी,इसका उचित भंडारण नहीं होने पर सरकार को करीब 80 करोड़ की चपत लगी। इस बार भी खरीदी जाने वाली प्याज के भंडारण को लेकर कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। खाद्य विभाग के प्रमुख सचिव केसी गुप्ता का कहना है कि खरीदी जाने वाली प्याज को मंडी से सीधे पीडीएस दुकानों पर भेजा जाएगा। इन दुकानों से इसकी बिक्री की जाएगी।
भंडारण की आवश्यकता भी हुई तो यह महज 10-15 दिनों के लिए होगी और इसे सामान्य भंडारगृहों में किया जा सकता है। श्री गुप्ता ने कहा कि प्याज भंडारण के लिए फिलहाल अलग से कोई विशेष गोदाम प्रदेश में नहीं है। गौरतलब है कि बीते साल प्याज को लेकर पैदा हुए उक्त हालात के बाद मुख्यमंत्री ने प्याज जैसे स्कंद के लिए विशेष प्रकार के गोदाम तैयार करवाने की घोषणा की थी। कहने का तात्पर्य यह कि सरकार की कथनी व करनी में खासा अंतर रहा है। सरकार के दावों व मैदानी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। यही बजह है कि लगातार पांच बार कृषि कर्मण अवार्ड जीतने वाले मध्यप्रदेश के किसान आज सड़कों पर हैं।
महाराष्ट्र में अक्टूबर तक कर्ज माफी का आश्वासन
मध्यप्रदेश की तरह महाराष्ट्र में भी किसान आंदोलन की राह पर हैं। हड़ताल समाप्त करने की बात हो या कर्ज माफी का मसला। किसानों को भरोसे में लेने का प्रयास करने के मामले में महाराष्ट्र सरकार ने बाजी मारी। हालांकि किसान आंदोलन को तोड़ने में प्रयास दोनों ही जगह एक जैसे रहे। दोनों ही सरकारों ने अपने जेबी संगठन को ही भरोसे में लेकर इस आंदोलन के समाप्त हो जाने का दावा किया। यह दाव दोनों ही राज्यों में असफल रहा। मंदसौर के हालात को देखते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि 31 अक्टूबर से पहले राज्य में परेशान और मुश्किल में फंसे किसानों की कर्ज माफी होगा। मैं सभी पार्टियों को सामने रखकर दावा करता हूं कि यह महाराष्ट्र के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी कर्ज माफी होगी। उन्होंने आगे कहा कि जो लोग राजनीति करना चाहते हैं वो करते रहें लेकिन राज्य की सराकर किसानों और जनता के साथ है।

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