भोपाल (अंडमान से लौटकर रवि अवस्थी)। एक ग्रामीण मां ने अपने किशोर बेटे को बीड़ी फूंकते देखा। मां बेहद चिंतित हो उठी। पहले तो उसने अपने बेटे को दो-चार तमाचे जड़े,लेकिन बालक नहीं सुधरा।
मां ने अंततः इमोशंस का सहारा लिया। उसे अपनी कसम दिलाई कि आज के बाद वह बीड़ी नहीं पियेगा। बालक भी द्रवित हो उठा, मां के सिर पर हाथ रख कसम खाई ,तेरी कसम माँ आज से बीड़ी नहीं पियूँगा। कुसंगति अपना असर दिखा कर ही रहती है। धूम्रपान की तलब लगते ही बालक ने दूसरा रास्ता चुना। बीड़ी छोड़ दी और सिगरेट पीने लगा।
केंद शासित प्रदेश अंडमान-निकोबार में तम्बाखू व सिगरेट के विक्रय को लेकर इस तरह के दोहरे मापदंड देख, सहसा ही यह किस्सा याद आ गया।
दरअसल,राज्य में तंबाकू व गुटखे के विक्रय पर गत 2 अक्टूबर 2016 से प्रतिबंध लगा दिया गया है,लेकिन सिगरेट,सिगार व शराब को इससे मुक्त रखा गया है और तम्बाखू की लत के आदि लोग अब सिगरेट में भरी तम्बाकू को चबा कर अपना शौक पूरा कर रहें हैं।
उक्त किस्से में गवईं मां भले ही भोलेपन में बीड़ी ,सिगरेट व सिगार में भेद न कर सकीं हो , लेकिन किसी व्यसन की लत में शासन स्तर पर इस तरह का फर्क अचरज तो पैदा करता ही है। वहां के स्थानीय लोग इसे अमीरी व गरीबी के भेद से जोड कर देख रहें हैं।उनका मानना है कि तम्बाखू के उपयोग पर प्रतिबन्ध पूरी तरह लगाया जाना चाहिए।
भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछली जनगणना के दौरान ही एक रिपोर्ट जारी की थी। इसके मुताबिक,केंद्र शासित अंडमान एवं निकोबार के महज एक फीसदी लोगों को ही गरीब माना गया। संभव है कि यह स्थिति वहां वर्ष 2004 में आई सुनामी के बाद केंद्र सरकार द्वारा प्रत्येक परिवार को दी जा रही तमाम तरह की सुविधाओं के कारण बनी हो,लेकिन महज, मुफ्त राशन,स्वास्थ्य व शिक्षा से ही गरीबी के मापदंड तय नहीं किए जा सकते।
यदि पिछली जनगणना के आंकड़ों पर ही गौर किया जाए तो अंडमान व निकोबार के ग्रामीण इलाकों में वैतनिक कार्य करने वालों में करीब 24 प्रतिशत लोगों को गरीब माना गया था। संभव है वक्त के साथ यह आंकडा और बढा हो। हालाँकि प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर प्रो. जगदीश मुखी का दावा है की प्रदेश में एक भी व्यक्ति भीख मांगते नहीं मिलेगा।
बहरहाल,यह एक अलग विषय है,लेकिन अपनी अध्ययन यात्रा के दौरान इस प्रतिनिधि ने जो देखा और पाया। उसके मुताबिक, इस केंद्र शासित प्रदेश की एक बडी आबादी ग्रामीण या वन क्षेत्रों में निवास करती है। शहरी क्षेत्रों में भी श्रमिक वर्ग की तादात अच्छी खासी है।
कालांतर में बाहरी श्रमिकों को ले जाकर वहां बसाना भी इसकी एक प्रमुख बजह हो सकती है। इनमें एक बडा तबका ऐसे लोगों का भी है जिन्हें तंबाकू के सेवन की लत विरासत में मिली या उन्होंने इसे शौकिया तौर पर अपनाया हो। तंबाकू चबाने को आमतौर पर गरीबों का शौक माना जाता है। वहीं अभिजात्य वर्ग इसका सेवन सिगरेट व सिगार यानि धूम्रपान के रुप में करता है। व्यसन कोई भी अच्छा नहीं है, न ही इसका समर्थन किया जा सकता,लेकिन गरीबों के शौक पर पाबंदी व अभिजात्य वर्ग के शौक पर छूट। इस तरह के दोहरे मापदंड आमजन में आक्रोश पैदा करते है।
इसकी अभिव्यक्ति निकोबार में हो चुकी है। सूत्रों के मुताबिक इस केंद्र शासित प्रदेश के उपराज्यपाल प्रो जगदीश मुखी गत दिनों जब निकोबार के दौरे पर पहुंचे तो वहां उन्हें इस मुद्दे को लेकर विरोध का सामना करना पडा। प्रदर्शनकारियों ने पान लाओ या वापस जाओ के नारे भी लगाए। दरअसल,अंडमान हो या निकोबार,दोनों ही द्वीपों के लोग जर्दा युक्त पान का सेवन बहुतायत में करते हैं। तंबाकू विक्रय पर प्रतिबंध के बाद उन्हें इससे वंचित होना पडा है। इस प्रतिबंध के बाद अंडमान में ही तंबाकूयुक्त पान चोरी छिपे बेचा जा रहा है। इसकी कीमत 50 से दो सौ रुपए प्रति पान है। जावरा जंगल में काॅन्वाय स्थल की दुकानों पर इस तरह के पान 50 से 100 रुपए में बिक रहे हैं,लेकिन शहरी क्षेत्र या बीचों पर केवल जाने.पहचाने लोगो को ही यह सुलभ है।
सीमित मीडिया
अंडमान यात्रा के दौरान एक कमी जो प्रमुख रुप से खली। वह है,मीडिया। आपको यह जानकर हैरत होगी कि करीब चार लाख से अधिक आबादी वाले इस इस केंद्र शासित प्रदेश में मीडिया की उपस्थिति नाम मात्र की है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, अंडमान की
राजधानी पोर्ट ब्लेयर से महज तीन समाचार पत्रों का प्रकाशन होता है। आठ पृष्ठों वाले इन समाचार पत्रों में दो द डेली टेलीग्राम व इको ऑफ़ इंडिया अंग्रेजी तथा आईलैंड न्यूज हिंदी समाचार पत्र है। पहला व अंतिम पत्र शासकीय हैं। एक दो और समाचार पत्र्र है अंडमान क्रॉनिकल, अंडमान साक्षी।
राजधानी पोर्ट ब्लेयर से महज तीन समाचार पत्रों का प्रकाशन होता है। आठ पृष्ठों वाले इन समाचार पत्रों में दो द डेली टेलीग्राम व इको ऑफ़ इंडिया अंग्रेजी तथा आईलैंड न्यूज हिंदी समाचार पत्र है। पहला व अंतिम पत्र शासकीय हैं। एक दो और समाचार पत्र्र है अंडमान क्रॉनिकल, अंडमान साक्षी।
इनमें ज्यादातर समाचार शासकीय,खेल व कुछ अन्य सामान्य गतिविधियों से जुडे होते हैं। अंदर के ज्यादातर पृष्ठों पर शासकीय विज्ञापनों की भरमार होती है। मीडिया के नाम पर पोर्ट ब्लेयर से हिंदी,अंग्रेजी व तमिल भाषाओं की 27 पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता है,लेकिन इनकी उपस्थिति बेहद सीमित है। बताया जाता है कि ज्यादातर पत्रिकाओं व साप्ताहिक समाचार पत्रों का प्रकाशन आज भी पुराने दौर की प्रिटिंग प्रेसों से ही होता है। संभवतया संसाधनों की कमी अथवा पेपर,स्याही आदि के लिए कोलकाता अथवा चैन्नई पर आश्रित होने के कारण यह स्थिति बनी।
मीडिया की यह कमी स्थानीय रहवासियों को भी खलती है। पोर्ट ब्लेयर मंे ही करीब पांच दशक से निवासरत एक सेवानिवृत शिक्षक आरके मिश्रा कहते हैं,अब यहां अन्य प्रांतों की तरह निजी मीडिया तो है नहीं। शासकीय अखबार जो पढाना चाहते हैं,उसी में संतोष करना पडता है। बाहरी दुनिया से रुबरु रहने के लिए टीवी एक सशक्त माध्यम है।
सोशल मीडिया पोर्ट ब्लेयर में भी पैर पसार चुका है,लेकिन दूरसंचार माध्यमों में ज्यादातर उपभोक्ता अब भी बीएसएनएल के भरोसे हैं। निजी कंपनियों में केवल वोडाफोन व एयरटेल ने ही यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पुअर नेटवर्क की समस्या वन क्षेत्र ही नहीं राजधानी में भी आम है,लिहाजा यदि आप अंडमान की यात्रा कर रहे हैं तो दूरसंचार की उक्त स्थिति को जरुर ध्यान रखेँ।



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