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रविवार, 21 मई 2017

अंडमानः संरक्षण के नाम पर जारवा आदिवासियों की नाकेबंदी


भोपाल। भारत के दक्षिण.पूर्व में सुदूर बंगाल की खाडी के बीच
बसे द्वीप अंडमान.निकोबार । एम्राल्ड आॅइल के नाम से पहचाने जाने वाले इन द्वीपों में यूं तो 572 टापू हैं,लेकिन इनमें से महज 36 ही आबाद हैं।  जारवा,आंगे,सेंटलिस और सेम्पियन आदि नीग्रिये प्रजाति के आदिवासियों को यहां का मूल रहवासी माना जाता है। जो सदियों पहले अफ्रीका से माईगे्रट होकर अंडमान पहुंचे। जारवा को छोड दिया जाए तो शेष प्रजाति के आदिवासियों की संख्या अंगुलियों पर गिने जाने लायक ही है। जारवा आदिवासियों की तादात भी कुछ खास नहीं। माना जाता है कि अंडमान ही नहीं विश्व में यह जनजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। भारत सरकार इनके संरक्षण के लिए प्रयासरत है,लेकिन संरक्षण के नाम पर इन्हें जंगल में नजरबंद कर दिया गया है। इससे इनके विकास की मुख्य धारा में आने की संभावनाएं भी क्षीण हो गई हैं। 
  अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के मौजूदा उप राज्यपाल प्रो.जगदीश मुखी के मुताबिक,अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में निवासरत आदिवासियों की प्रजातियों को बचाने के लिए सरकार दिलोजान से प्रयास कर रही हैं। इन्हेें विकास की मुख्यधारा से जोडने इनके बीच काम करने वाली आदिवासी कौंसिल का सहारा लिया जा रहा है। उनके इस दावे के विपरीत हालात कुछ अलग है। अंडमान के प्रमुख आदिवासी जारवा प्रजाति के आदिवासियों की ही बात की जाए तो संरक्षण के नाम पर इन्हें एक तरह से जंगलों में नजरबंद कर दिया गया है। न तो यह आदिवासी बाहरी दुनिया के लोगों से मिल सकते हैं और न ही बाहरी व्यक्तियों को इनके पास जाने की इजाजत है। अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर  से जारवा पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या बहुतायत में हैं। सभी की उत्सुकता एक ही होती है, इन आदिवासियों की  एक झलक पाने की। टेढ़े-मेढे रास्तों से होकर जारवा के जंगलों से गुजरने वाले पर्यटकों को उस वक्त निराशा का सामना करना पडता है जब उन्हें  इन आदिवासियों की एक झलक भी नसीब नहीं होती।  अलबत्ता जगह-जगह पुलिस के जवान अवश्य खड़े  मिलते हैं। सूत्र बताते हैं कि इनकी तैनाती जारवा के जंगलों में रहने वाले उक्त आदिवासियों को मुख्य मार्ग पर आने व पर्यटकों के जंगल में प्रवेश को रोकने के लिए ही की गई है। यही नहीं बीच रास्ते में एक पुलिस चैकी भी है। जहां जारवा आदिवासियों के आदमखोर होने का भय दिखाकर पर्यटकों व उनके वाहनों को झुंड के रुप में आगे के लिए रवाना किया जाता है। तात्पर्य यह कि आदिवासियों की विलुप्त होती इस प्रजाति व आम आदमी के बीच अंडमान का शासन.प्रशासन एक दीवार का काम कर रहा है। ऐसे में इन आदिवासियों का बाहरी दुनिया से संपर्क कैसे होगा । वे विकास की मुख्य धारा से किस तरह जुड सकेंगे। इसका जवाब तब ही मिल सकता है जब इन आदिवासियों के नाम पर केंद्र सरकार से मिल रही विकास राशि की बंदरबांट बंद हो।
जारवा आदिवासियों का इतिहास
साउथ अंडमान आइलैंड में रहने वाली जारवा जनजाति दुनिया की सबसे पुरानी जनजातियों में से एक है, जो आज भी अपनी सदियों पुरानी परंपराओं और तौर-तरीकों के हिसाब से ही चल रही है. अफ्रीका से आकर अंडमान आइलैंड पर बसने वाली करीब 5 हजार साल पुरानी इस जनजाति की कुल आबादी पिछली जनगणना के मुताबिक करीब 335 ही है। जारवा लोगों की त्वचा का रंग एकदम काला होता है और कद छोटा होता है। कहते हैं कि अगर कोई बाहरी आदमी इनके दायरे में प्रवेश करता था, तो ये लोग उसे देखते ही मार देते थे, हालाँकि वर्ष 1998 के बाद इनकी इस आदत में बहुत बदलाव आ चुका है। इससे पहले बाहरी दुनिया के लोगों से इनका कोई संपर्क नहीं था। जारवा जनजाति अब भी तीर-धनुष से अपने लिए शिकार करती है। इनकी महिलाओं को पर्यटकों के आगे अर्धनग्न नचवाने के कुछ मामले भी सामने आए हैं। इस कार्य के लिए बिस्किट और सिक्कों का लालच दिया जाता है इस समुदाय में परंपरा के अनुसार यदि बच्चे की माँ विधवा हो जाए या उसका पिता किसी दूसरे समुदाय का हो तो बच्चे को मार दिया जाता है। बच्चे का रंग थोड़ा भी गोरा हो तो कोई भी उसके पिता को दूसरे समुदाय का मानकर उसकी हत्या कर देता है और समुदाय में इसके लिये कोई दंड नहीं है। बताया जाता है कि इन आदिवासियों  के संरक्षण के लिए तैनात पुलिस के एक सिपाही को भी इसी अग्निपरीक्षा से गुजरना पडा था।  संभव है कि 90 के दशक में बाहरी दुनिया से आदिवासियों के इस मेलजोल को ही उनके लिए खतरा मानते हुए ही उन्हें नजरबंद करने का तरीका अपनाया गया हो। यहां तक कि जारवा जाने वाले मार्ग को भी प्रशासन ने बंद कर दिया था,जिसे कोर्ट के आदेश पर पुनः खोला गया। बरहहाल ,परंपरा के नाम पर जारवा आदिवासी कच्चा मांस खाकर ही अपनी जिन्दगी जीते हैं. जारवा जनजाति आज भी तीर-कमान के साथ ही शिकार करने की परंपरा का पालन करती है. इस जनजाति से जुड़े ऐसे कई मामले लगातार सामने आते रहे हैं, लेकिन पुलिस को इसमें दखल न देने का आदेश है. पुलिस कभी भी इस जनजाति के किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए गिरफ्तार नहीं करती है। इस तरह यह जनजाति अंडमान को हिस्सा होते हुए भी इस देश के नियम .कायदे व समाज से पूरी तरह कटी हुई है। अब ऐसे में इन्हें विकास की मुख्य धारा में कैसे लाया जा सकेगा यह सवाल भविष्य के गर्त में है।

 दरअसल, दक्षिणी अंडमान की इस मानव प्रजाति ,इनके तौर तरीके व शेष अंडमान की संस्कृति व यहां के रहवासियों के तौर तरीकों को जानने के लिए मप्र विधानसभा प्रेस दीर्घा सलाहकार समिति के एक दल ने हाल ही में दक्षिण.पूर्वी भारत के इस द्वीप का दौरा किया। इस दल में यह प्रतिनिधि भी शामिल रहा। दौरे की शुरुआत वहां के उप राज्यपाल प्रो.जगदीश मुखी से मुलाकात के साथ हुई। जो केंद्र शासित इस प्रदेश में विकास के लिए किए जा रहे कामों की गिनाते नहीं थकते। प्रो.मुखी कहते हैं, केंद्र सरकार ने अंडमान व निकोबार द्वीप समूह के लिए बहुत कुछ किया है। फिर वह मौजूदा सरकार हो या पूर्ववर्ती। 

उपराज्यपाल के तौर पर बीते साल ही इस द्वीप समूह की कमान संभालने वाले प्रो.मुखी का दावा है कि इस द्वीप समूह में हर वर्ग के लोगों के लिए मुफ्त शिक्षा,भोजन,स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हैं। 26 दिसंबर 2004 को हिंद महासागर में आई सुनामी के बाद तो यहां जैसे सुविधाओं की बाढ आ गई है। क्या अमीर  और क्या गरीब। सभी के लिए एक समान सुविधाएं। इसके चलते स्थानीय रहवासियों में अर्न टू मोर की महत्वकांक्षा ही नहीं रही। उपराज्यपाल के इस दावे के गवाह अंडमान के वे खेत भी हैं जिनमें कभी धान व दीगर फसलें लहलहाती थीं,लेकिन सुनामी से इन खेतों में समुद्र का पानी भर गया। सरकारी सुविधाओं के चलते लोगों ने अपने खेतों को पुनः उपजाउ बनाने की बजाए इन्हें प्रकृति के भरोसे छोड दिया। इसके चलते उनके खेत दरिया बन कर रह गए। इनमें पनपते मच्छर आज इस प्रदेश में  डेंगू व मलेरिया की प्रमुख बजह हैं। सुनामी के बाद बफर जोन घोषित किए जा चुके इन खेतों व शासकीय भूमि पर भू माफिया की नजर भी है जो अवैधानिक तरीके से  कब्जा कर इनकी खरीद फरोख्त कर रहा है। खास बात यह है कि प्रदेश प्रशासन इस मामले में आंखें बंद किए हुए है। उप राज्यपाल को मलाल है तो इस बात का कि इस प्रदेश में विधायिका नहीं है। इसके चलते विकास के लिए त्वरित लिए जा सकने वाले निर्णयों में कभी.कभार विलंब भी होता है। 
 वीर सावरकर की ही चर्चा  
 अध्ययन दल ने अपनी यात्रा के पहले दिन उप राज्यपाल से मुलाकात के बाद  स्मारक बन चुकी सेल्युलर जेल का दौरा किया। अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी। इस जेल के अंदर 694 कोठरियां हैं। इन कोठरियों को बनाने का उद्देश्य बंदियों के आपसी मेल जोल को रोकना था। आक्टोपस की तरह सात शाखाओं में फैली इस विशाल कारागार के अब केवल तीन अंश बचे हैं। कारागार की दीवारों पर वीर शहीदों के नाम लिखे हैं। यहां एक संग्रहालय भी है जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है जिनसे स्वतंत्रता सैनानियों पर अत्याचार किए जाते थे। वृत चित्र के जरिए पर्यटकों को जेल का इतिहास बताने के लिए रोजाना शाम जेल प्रागंण में लाइट एंड साउंड सिस्टम नामक एक कार्यक्रम का आयोजन होता है। खास बात यह है कि करीब एक घंटे की इस फिल्म में जेल में कैद रहे वीर सावकार के बलिदान को बढा चढा कर पेश किया गया है,जबकि अन्य कैदियों को अपेक्षाकृत कम महत्व मिला। कमोवेश यही स्थिति पोर्ट ब्लेयर के ही एक अन्य मुहाने पर बने राॅस द्वीप पर प्रदर्शित की जाने वाली फिल्म की भी है। तल्कालीन अंग्रेजी शासन काल की पाॅश कालोनी कहे जाने वाले इस द्वीप के इतिहास को लेकर प्रसिद्व लेखक व गीतकार गुलजार की खनकती आवाज में रोजाना एक वृत्त चित्र का प्रदर्शन किया जाता है। फिल्म में एक अल्पसंख्यक क्रांतिकारी के बलिदान को बढ़ा-चढ़ा  कर पेश किया गया तो एक अन्य  क्रांतिकारी दूधनाथ तिवारी के पक्ष को रखने में नाइंसाफी हुई। तिवारी की कथित नकारात्मक छवि को अतिरंजना के साथ  पेश किया गया। उक्त तथ्य बताते हैं कि अंडमान के इतिहास की गाथा भी मौजूदा राजनीति से अछूती नहीं रह गई है। दूसरे दिन अंडमान के प्रसिद्ध द्वीप कार्बिन कोव्स जाॅली बाया व राॅस द्वीप का अवलोकन किया।


खाडी में बढता प्रदूषण
 यात्रा के तीसरा दिन बंगाल की खाडी व बारहतांगा द्वीप में गुजरा। इसका रास्ता जारवा के जंगल से होकर ही जाता है। पर्यटकों की भरमार और इनके परिवहन के लिए खाडी में दौडती मोटर बोट व पुराने जहाज इसके जल को बुरी तरह प्रदूषित कर रहे हैं। जहाजों का काला तेल खाडी के जीव.जंतुओं के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। अलबत्ता इस खाडी के मुहाने पर कतारबद्ध खडे मेंग्रोज के वृक्ष सुंदरवन की याद को ताजा करते हैं। 


इन्हीं वृक्षों के बीच बने पहाड के दर्रों में बने लाइम स्टोन पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। अंडमान वन विभाग ने इस दर्रे की खूबसूरती को बरकरार रखने में कडी मशक्कत की है। यहां मोटर वोट के जरिए ही पहुंचा जा सकता है। अंडमान से करीब सौ किमी की दूरी पर बसे इस पर्यटन स्थल पर्यटकों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ही नहीं पुलिस का अमला भी इन जंगलों में पूरे दिन तैनात रहता है। अंडमान में हमारी यात्रा का चैथा दिन हेवलाॅक के नाम था। हिंद महासागर के बीच एवं पोर्ट ब्लेयर से करीब 55 किमी दूर बसे इस द्वीप पर जहाज की मदद से ही पहुंचा जा सकता है। विशाल पोतवाहक जहाज परिवहन का मुख्य साधन हैं। अपने नाम के अनुरुप हैवलाॅक का अद्भुत सौंदर्य पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।  पोर्ट ब्लेयर की तरह हैवलाॅक भी एक विकसित बस्ती है। यहां मनोरंजन व पर्यटन के समुचित साधन ,सुविधाएं सुलभ हैं। 


अदभुत सौंदर्य
 प्रकृति ने अंडमान को सौंदर्य से लवरेज रखा है।  तैरते एम्राल्ड द्वीपों और चट्टानों का समूह अंडमान के तट मेंग्रोज  ,नारियल और खजूर के वृक्षों से सजे हैं ।  वहीं बंगाल की खाडी व हिंद महासागर का पारदर्शी कंचन जल इसके नीचे समुद्रीय जीवों यानि कोरल की मनमोहक छटा मन को आनंद देने वाली है। इन द्वीपों की प्रदूषण रहित हवा,जानवर और नायाब प्रजातियों वाली  वनस्पति मन को प्रफुल्लित कर देती है। पोर्ट ब्लेयर में अंडमान वाॅटर स्पोर्ट काॅम्पलेक्सए चटम साॅ मिलए चिडि़या टापू, मरीन संग्रहालय, रेड स्किन द्वीप ,हैवलाॅक और अन्य आकर्षण भी हैं। कोर्बिन कोव, वंदूर समुद्र तट, सिप्पिघाट वाॅटर स्पोर्ट्स काॅम्पलेक्स, सिंक द्वीप और जाॅली बोया द्वीप यहां के कुछ रोमांचक स्थल हैं।
 इन तथ्यों को भी जानें
 हालांकि हमारी यात्रा केवल अंडमान तक सीमित थी,लेकिन निकोबार के तथ्यों को शामिल किए बिना इस केंद्र शासित प्रदेश के बारे में कुछ कहना अधूरा ही माना जाएगा। बंगाल की खाड़ी में स्थित ‘अंडमान और निकोबार’ द्वीप समूह लगभग 780 किलोमीटर लम्बाई में फैला हुआ है.572 छोटे-बड़े द्वीपों से मिलकर बने इस केन्द्रशासित प्रदेश में 2011 की जनसँख्या के आंकड़ों के अनुसार लगभग 4 लाख की आबादी निवास करती है. अधिकतर लोग दक्षिणी अंडमान में, या कहें तो पोर्टब्लेयर के आसपास ही रहते हैं.। अन्य प्रांतों की तरह अंडमान में भी लिंगानुपात हजार पुरुषों पर 878 महिलाओं का है। इस प्रदेश के कुछ द्वीप तो इतने छोटे हैं, कि उन्हें नजरअंदाज भी किया जा सकता है. लेकिन ऐसे द्वीपों की संख्या भी लगभग 300 के आसपास आंकी गयी है, जिन्हें कुल मिलाकर द्वीप कहा जा सकता है. मजे की बात यह है कि इनमें से कुल छत्तीस द्वीप ही ऐसे हैं, जहाँ पर मानव जीवन निवास करता है. 24 अंडमान में और 12 निकोबार द्वीप समूह में. प्रशासनिक दृष्टि से पूरे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को तीन जिलों में बांटा गया है. पहला उत्तरी और मध्य अंडमान, जिसका मुख्यालय ‘मायाबंदर’ है. दूसरा दक्षिणी अंडमान, जिसका मुख्यालय ‘पोर्टब्लेयर’ है. और तीसरा निकोबार द्वीप समूह, जिसका मुख्यालय ‘कार’ द्वीप में है. इस द्वीप समूह का धुर उत्तरी हिस्सा बर्मा से सिर्फ 180 किलोमीटर दक्षिण में है और सबसे दक्षिणी हिस्सा ‘इंदिरा प्वाईंट’ इंडोनेशिया से सिर्फ 150 किलोमीटर उत्तर में। करीब एक दशक पूर्व इस द्वीप पर आई सुनामी के दौरान करीब छह हजार लोगों की मौत ने इस केंद्र शासित प्रदेश को दहला दिया था। बावजूद इसके यहां के लोगों में जीवन और विकास के प्रति उत्साह में कोई कमी नहीं आई। अंडमान में मिलीजुली संस्कृति के दर्शन होते हैं। यहां विभिन्न जातियों के लोग निवास करते हैं। अधिकांश परिवार में विभिन्न जातियों के बीच हुए वैवाहिक संबंध सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल पेश करते हैं। खास बात यह कि विविध प्रांतों के मूल रहवासी व अलग.अलग भाषा भाषी होने के बाद इनकी प्रमुख एक भाषा है हिंदी। राजभाषा के प्रति इस तरह का अनुराग शायद ही किसी अन्य प्रांत में देखने को मिले जो अंडमान में है।

गरीबी,बेरोजगारी से जूझता कोलकाता
अंडमान की इस यात्रा में कोलकाता का जिक्र अटपटा लगता है,लेकिन हमारी सात दिवसीय यात्रा  के अंतिम दो दिन कोलकाता व हवाई यात्रा में गुजरे। भीषण गर्मी के बीच कोलकाता की यात्रा अंडमान की वादियों में मिली खुशी को काफूर करने के लिए काफी थी। सडकों पर वाहनों व लोगों की भीड,गरीबी,बेरोजगारी,भिक्षावृति,वेश्यावृति,विस्थापित बांग्लादेशी नागरिकों की भरमार और सडकों के किनारे पसरी गंदगी के दर्शन से उपजी निराशा को माॅ काली के दर्शन और गंगा स्नान कर दूर किया। इसी दरम्यान वहां के प्रसिद्ध विक्टोरिया स्मारक स्थल पर जाना भी हुआ।

देश को आजादी मिलने के सात दशक बाद भी इस स्मारक में तत्कालीन शासक महारानी विक्टोरिया व क्लाइव लाॅयड की मूर्तियों  व उनकी लिपिबद्व गाथाओं को देख मन में एक ख्याल यह भी आया कि क्या हम अंग्रेजों की गुलामी से वाकई आजाद हो गए? स्मारक के नाम पर पर इन अंग्रेज शासकों की मूर्तियों को निहारना व उनकी सराहना करना क्या हमारी नियति बन गया है। यह भी हैरत में डालने वाला है कि कोलकाता शहर के कुछ चौराहों  व भवनों के नाम आज भी तत्कालीन अंग्रेज शासकों या उनके कारिंदों के नाम पर हैं। माना कि मौजूदा कोलकाता की नींव तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अंग्रेज शासक जाॅब चार्नोक ने वर्ष 1690 में रखी थी,लेकिन जिस तरह 17 साल पहले इस शहर के अंग्रेजी नाम को बदलकर कोलकाता किया गया। इसी तरह शहर में अंग्रेज शासकों की याद दिलाने वाले इन  भवनों, चौराहों  व स्मारकों के नाम क्यों नहीं बदले जा सकते ?

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Ditulis Oleh : Janprachar.com Hari: 6:11 am Kategori:

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