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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना पर सवालिया निशान

रवि अवस्थी,भोपाल। यदि पाइप लाइनों के जरिए नदियां जिंदा हो सकतीं तो अब तक शायद देश की कोई नदी सूखी नहीं रहती,लेकिन सूबे की सरकार चार-चार पंपिंग स्टेशनों के जरिए नर्मदा का पानी क्षिप्रा तक पहुंचाने का प्रयास कर मालवांचल के लोगो को दिवा स्वप्न दिखा रही है। तीन चरणों में उज्जैन के पड़ौसी शहर इंदौर पहुंची  जिस नर्मदा व  यशवंतसागर का 325 एमएलडी जल इस शहर के वाशिंदों की  प्यास नहीं बुझा सका,तब महज 362 एमएलडी क्षमता वाली नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना से क्षिप्रा, गंभीर,कालीसिंध और पार्वती को जिंदा करने के साथ ही समूचे मालवांचल की जरूरत पूरी करने के दावे पर कैसे भरोसा किया जा सकता है? नदी जोड़  की सामान्य परिकल्पना यही है,कि नहर बना कर या पानी का  बहाव मोड़ कर एक नदी का दूसरे से प्राकृतिक  मिलन कराना,लेकिन नकल की होड़  जिद बन जाए तो परिणाम इस तरह की खर्चीली परियोजनाओं के रूप में सामने आना स्वभाविक है। 
राज्य की दो प्रमुख नदी केन-बेतवा को मिलाने की विस्तृत सर्वेक्षण रिपोर्ट (डीपीआर)तैयार हुए करीब आठ साल से ज्यादा वक्त बीत गया है। इस पर अमल किया जाता तो यह राज्य की पहली नदी जोड़ परियोजना होती। इससे विंध्य,बुंदेलखंड व प्रदेश के मध्य इलाके के किसानों को सिंचाई के लिए भरपूर पानी मुहैया हो सकता था। कमोवेश यही बात कालीसिंध व चंबल नदी जोड़ परियोजना पर भी साबित होती है,लेकिन इसके उलट तीन साल पहले मालवांचल के लिए नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना का खाका तैयार कर इसे आनन-फानन में अमली जामा भी पहना दिया गया। जल्दबाजी में इस तरह की परियोजना को मूर्तरूप देने का जो हश्र होता है। वही नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना का भी हुआ। परियोजना के शुभारंभ मौके को छोड़ दिया जाए तो चार माह से अधिक समय बीतने के बाद भी नर्मदा का एक बंूद पानी क्षिप्रा को नहीं मिला। इसके उलट हर माह करीब पौने दो करोड़ रुपए की चपत नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को बिजली बिल के रूप में लग रही है और क्षिप्रा में वही गंदे नालों का पानी प्रवाहित हो रहा है। यह खरी बात इस परियोजना के लिए जबरिया भागीरथ बनने वालों को शायद रास न आए लेकिन यह तय ,कि यह परियोजना नदी जोड़ के वास्तविक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करती। दूरगामी मामलों में परियोजना कितनी सार्थक साबित होगी। इस बात का आंकलन प्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के इस कथन से किया जा सकता है ,कि सीएम शिवराज सिंह चौहान ने असंभव को संभव कर दिखाया है। अब मालवा क्षेत्र हरा-भरा होगा और तरक्की की नई इबारत लिखेगा।  '' बशर्ते, सरकार पानी खींचने के लिए बिजली से निरंतर पंप चलाती रहे। 
वोट बैंक की खातिर
 जानकारों का मानना है,कि मालवांचल में अपने फिसलते वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखने के लिए राज्य शासन ने नर्मदा से जुड़ा यह धार्मिक कार्ड खेला। दूसरा ध्येय सिंहस्थ के दौरान क्षिप्रा में पर्याप्त जल मुहैया कराने का रहा,ताकि इस महाकुंभ में पानी की कमी बदनामी का कारण न बने। तीसरा इरादा नर्मदा जल के उपयोग का है। नर्मदा जल बंटवारा प्राधिकरण ने मध्यप्रदेश के लिए नर्मदा जल उपयोग की जो समय सीमा तय की थी उस अवधि में प्रदेश नर्मदा के अपने हिस्से के जल का समुचित उपयोग कर पाने में असफल रहा है। हालांकि यह अवधि 2024 तक है,लेकिन नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की परियोजनाओं की जो मौजूदा गति है। उसे देख कर मप्र इस शेष अवधि में भी नर्मदा जल के अपने हिस्से के जल का पूरा उपयोग कर सकेगा। इसमें संशय बना हुआ है। इसी कड़ी में नर्मदा का जल पहले क्षिप्रा और अब उज्जैन जिले की ही गंभीर नदी में छोड़ने की नई योजना तैयार की गई है। नर्मदा को कथित तौर पर क्षिप्रा से मिलाने की प्रारंभिक लागत  432 करोड़ रुपए है। वहीं नर्मदा-गंभीर लिंक परियोजना के लिए करीब साढ़े 12 सौ करोड़ रुपए का नया प्रस्ताव गत दिनों केंद्र सरकार को सौंपा गया है।राज्य शासन का दावा है,कि सिंहस्थ से पूर्व वह नर्मदा को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त कर इसे नर्मदा जल से लबालब कर देगी ताकि सिंहस्थ में आने वाले श्रद्धालु इसमें स्नान कर सकें। दरअसल,यह परियोजना गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी क ी नकल करने का प्रयास का भी नतीजा है। श्री मोदी ने नर्मदा जल उपयोग के लिए इसका जल वहां की साबरमती नदी में डाल कर सूबे की सिंचाई क्षमता को बढ़ाया,लेकिन साबरमती में नर्मदा का मिलन प्राकृतिक तरीके से किया गया,न कि चार-चार पंपिंग स्टेशनों के जरिए। नतीजतन,साबरमती-नर्मदा लिंक परियोजना सार्थक साबित हुई। जल-ऊर्जा क्षेत्र में शोघ करने वालों की माने तो इस परियोजना के पीछे सरकार का एक छिपा हुआ एजेंडा भी है। उनका मानना है,कि  ''योजना के लिए पानी नर्मदा पर निमार्णाधीन ओंकारेश्वर परियोजना की नहरों से लिया जाना है। इस पानी के लिए निमाड़ के किसानों को दशकों से सपने दिखाए जा रहे हैं। लेकिन यह पानी निमाड़ के खेतों में पहुंच पाता, इससे पहले ही मालवा की नदियों को जिंदा करने और इलाके का जल संकट खत्म  करने के सपने दिखाए जाने लगे हैं। इस पाइपलाइन को पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र की ओर मोड़ा गया है। उद्योगों की खातिर प्रदेश सरकार ने पहले निमाड़ को छला, अब मालवा को छल रही है।
 क्षिप्रा में नालों का पानी
क्षिप्रा में प्रदूषण का यह मामला गत दिनों राज्य विधानसभा में कांग्रेस के जीतू पटवारी ने ध्यानाकर्षण सूचना के जरिए उठाया।  इससे जवाब में सरकार ने माना ,कि क्षिप्रा में उज्जैन व देवास जिले के 11 नालों के अलावा इंदौर की सीवेज लाइन का प्रदूषित जल भी मिल रहा है। सूचना के जवाब में नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने जो कहा, कि देवास शहर का घरेलू जल मल क्षिप्रा नदी में मिलता है। इससे पबंधन हेतु यूआईडीएसएस एमटी योजनान्तर्गत 40 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की गई है। इसमें तीन घरेलू जल उपचार संयंत्र स्थापित किए जाने हैं। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के तहत उज्जैन के सदावल में 52 एमएलडी क्षमता का उपचार संयंत्र स्थापित किया गया है। इसमें 11 नालों का  इंटरसेप्शन डायवर्सन कर घरेलू दूषित जल मल पहुंचता है। प्रश्नकर्ता विधायक द्वारा यह बताए जाने पर कि सदावल का यह संयंत्र भी अपनी स्थापना के समय से ही बंद है। मंत्री ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा कि सदावल संयंत्र की क्षमता कम होने व उज्जैन का घरेलू दूषित जल क्षिप्रा में मिलने से रोकने के लिए 14एमएलडी व 08 एमएलडी  क्षमता के दो और जल उपचार संयंत्र सदावल व पिपलिया खाल में जेएनएनयूआरएम योजना के तहत बनाए जाना प्रस्तावित है। इनके लिए करीब 330 करोड़ रुपए की स्वीकृति प्रदान की गई है। वही उज्जैन जिले के कूड़ा-करकट को नष्ट करने के लिए करीब 33 करोड़ रुपए की लागत से जिले के ग्राम गोंदिया में योजना बनाई गई है। नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री ने कहा कि इंदौर शहर से होकर बहने वाली खान नदी के जरिए भी इंदौर का करीब 240 एमएलडी प्रदूषित सीवेज जल क्षिप्रा में मिलता है। इसे रोकने के लिए राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजनान्तर्गत ही 78 एमएलडी व 12 एमएलडी क्षमता के दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए गए हैं। वहीं करीब 122 एमएलडी क्षमता के दो और संयंत्र नगर निगम इंदौर द्वारा तैयार किए जा रहे हैं। यह आगामी जून तक बन कर तैयार हो जाएंगे। इंदौर एवं सांवेर औद्योगिक क्षेत्र के अन्य गंदे नालों का पानी खान में जाने से रोकने के लिए भी भूमिगत पाइप लाइन बिछाने का कार्य जारी है। इससे इस प्रदूषित जल को क्षिप्रा में मिलने से रोका जा सकेगा। नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री का यह जवाब क्षिप्रा की वर्तमान स्थिति का खुलासा करने के लिए काफी है। 
आडवाणी ने पढ़े थे कसीदे
 भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गत 25 फरवरी को उज्जैन जिले के ग्राम उज्जैनी में  इस परियोजना का शुभारंभ किया। भाजपा की वरिष्ठ नेत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ,नितिन गडकरी व बाबा रामदेव भी इस समारोह के साक्षी बने। बदले राजनैतिक हालातों में एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे श्री आडवाणी ने राज्य सरकार की शान में कसीदे पढ़ते हुए कहा,कि मुझे खुशी हो रही है कि जो सपना हमारे नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने देखा था, उसे मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार ने साकार कर दिखाया। उज्जैन महाकालेश्वर की वजह से प्रसिद्ध है, तो उज्जैनी नर्मदा-क्षिप्रा संगम की वजह से दूसरा तीर्थ स्थल बनेगा।आडवाणी ने आगे कहा कि जब केन्द्र में एनडीए की सरकार थी और वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने नदियों को जोड़ने की योजना बनाई थी। उनकी कल्पना थी कि देश का कोई भी राज्य और किसान पानी के अभाव में न रहे। 2004 में कांग्रेस नीति की सरकार आई पर उसने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। उन्होंने कहा कि कई देशों में नदियां नहीं है लेकिन हिन्दुस्तान में नदियों का जाल बिछा हुआ है। कुछ नदी सूख गई, इन्हें फिर से नदी जोड़ो योजना के माध्यम से जीवित किया जा सकता है। ऐसा यदि हुआ तो देश में करिश्मा हो जाएगा। किसी राज्य में सूखे की स्थिति निर्मित ही नहीं होगी।  इस मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था, कि जब उन्होंने इस योजना के बारे में बात की तो कहा गया कि यह सम्भव नहीं है, लेकिन दृढ़ विश्वास और मेहनत से नर्मदा-क्षिप्रा का मिलन हो सका। प्रदेश की दूसरी नदियों को भी जोड़ा जाएगा, हमारी कोशिश है कि किसान और जनता पानी के लिए न तरसे। इस योजना को लेकर प्रदेश सरकार का दावा है कि इस योजना से जहां तिल-तिल करके मर रही क्षिप्रा को नई जिंदगी मिलेगी, वहीं हर साल पानी के गंभीर संकट से जूझने के आदी हो चुके मालवा क्षेत्र को भरपूर पानी मिलने लगेगा।  प्रथम चरण में ओंकारेश्वर परियोजना सिसलिया तालाब से नर्मदा जल का क्षिप्रा में प्रवाह होगा। आगामी चरणों में महेश्वर से नर्मदा जल उद्वहन कर गम्भीर नदी में व  इंदिरा सागर जलाशय से नर्मदा जल उदवहन कर कालीसिंध और पार्वती नदी में प्रवाह किया जायेगा। इन परियोजनाओं के पूर्ण हो जाने पर मालवा क्षेत्र में 17 लाख एकड़ में सिंचाई सुलभ होगी। साथ ही इससे मालवा क्षेत्र की पेयजल समस्या का भी स्थाई समाधान होगा। मालवा की नदियों में प्रवाहित होता नर्मदा का जल 70 कस्बों और 3000 गाँव की प्यास बुझायेगा।  नर्मदा जल की उपलब्धता से मालवांचल में औद्योगिक विकास की गति तेज होगी। वर्तमान और भावी सैकड़ों उद्योगों को जल उपलब्ध हो सकेगा। परियोजना का एक उल्लेखनीय लाभ यह होगा कि प्रत्येक 12 वर्ष में उज्जैन में आयोजित विश्व प्रसिद्ध सिंहस्थ मेले में आने वाले लाखों श्रद्धालु के पवित्र स्नान और अन्य जल आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकेगी
सरकार के इस दावे के बाद  मालवा के लोग नर्मदा के पानी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। 
14 माह में कर दिया कमाल
 ''इस परियोजना के लिए नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) के इंजीनियरों ने करीब 14 माह के भीतर काम पूरा कर दिया है। इसके लिए, नर्मदा के पानी को पंपों के जरिए 50 किलोमीटर की दूरी तक बहा कर लाया गया और फिर 350 मीटर की ऊंचाई पर लिफ्ट करके क्षिप्रा के उद्गम स्थल उज्जैनी गांव तक पहुंचाया गया। इससे पहले तक, उज्जैनी गांव में क्षिप्रा नाम मात्र को ही नजर आती थी। '' परियोजना के पहले चरण के सफल परीक्षण के बाद शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि अब गंभीर नदी, काली सिंध और पार्वती नदी को भी नर्मदा नदी से जोड़ा जाएगा। वह  नर्मदा और क्षिप्रा के संगम स्थल उज्जैनी गांव को पवित्र स्थल के तौर पर विकसित करने की घोषणा भी  कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के ही अनुसार,शुरुआत में जब उन्होंने अधिकारियों से इस परियोजना के बारे में बातचीत की तो सभी ने एक सुर में इसे असंभव बताया। बहरहाल, 8अगस्त 2012 को इस परियोजना का अनुमोदन दिया गया और 27 अगस्त को निविदाएं बुलवाईं गई। दो माह के दरम्यान ही 19 अक्टूबर को परियोजना की प्रशासकीय स्वीकृति हुई और  29 नवम्बर क ो इंदौर से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उज्जैनी ग्राम में मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी के उदगम स्थल क्षिप्रा टेकरी पर 432 करोड़ लागत की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के निर्माण का भूमि-पूजन एवं शिलान्यास हुआ।  गत 25 फरवरी को पाइप लाइन के जरिए जल पहुंचा कर परियोजना का लोकार्पण हो गया। जानकारों का मानना है,कि विधानसभा चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता लागू नहीं होती तो यह काम गए साल के अंत तक ही हो जाता। नर्मदा क्षिप्रा लिंक परियोजना के बाद अब नर्मदा का पानी गंभीर नदी में लाया जाएगा इसके लिए 2100 करोड़ रू. की योजना प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर उन्हें इस परियोजना के शिलान्यास समारोह में आने का न्यौता भी दे डाला। परियोजना के प्रथम चरण में ओंकारेश्वर परियोजना सिसलिया तालाब से नर्मदा जल का क्षिप्रा में प्रवाह होगा। आगामी चरणों में महेश्वर से नर्मदा जल उदवहन कर गम्भीर नदी में इंदिरा सागर जलाशय से नर्मदा जल उदवहन कर कालीसिंध और पार्वती नदी में प्रवाह किया जायेगा। इन परियोजनाओं के पूर्ण हो जाने पर मालवा क्षेत्र में 17 लाख एकड़ में सिंचाई सुलभ होगी। साथ ही इससे मालवा क्षेत्र की पेयजल समस्या का भी स्थाई समाधान होगा। मालवा की नदियों में प्रवाहित होता नर्मदा का जल 70 कस्बों और 3000 गाँव की प्यास बुझायेगा।  नर्मदा जल की उपलब्धता से मालवांचल में औद्योगिक विकास की गति तेज होगी। वर्तमान और भावी सैकड़ों उद्योगों को जल उपलब्ध हो सकेगा। परियोजना का एक उल्लेखनीय लाभ यह होगा कि प्रत्येक 12 वर्ष में उज्जैन में आयोजित विश्व प्रसिद्ध सिंहस्थ मेले में आने वाले लाखों श्रद्धालु के पवित्र स्नान और अन्य जल आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकेगी। नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना से पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र  को भी पानी देने की योजना है। राज्य मंत्रिपरिषद पहले ही पीथमपुर जल प्रबंधन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी गठित करने की मंजूरी दे चुकी है। इससे पीथमपुर, बेटमा और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों के साथ ही आम लोगों के लिए भी 90 एमएलडी पानी प्रदाय किया जाएगा। योजना का पहला चरण 2017 में पूरा होगा और इसमें 31 एमएलडी पानी पीथमपुर पहुंच जाएगा। पूरा प्रोजेक्ट 306 करोड़ रु. का है। इसके लिए भारत सरकार से 17.15 करोड़ रुपए और एकेवीएन इंदौर से 17.85 करोड़ रुपए भी कंपनी को मिल चुके हैं। 
 संत समाज विरोध में 
 नर्मदा को क्षिप्रा से मिलाए जाने पर संत समाज नाराज है। विशेषकर नागा साधु इस परियोजना को लेकर सरकार से खफा हैं। धार्मिक दृष्टि से नर्मदा शिव की पुत्री है और कुंवारी है। नर्मदा के प्रति इसी आस्था के चलते  नागा साधु नर्मदा में स्नान नहीं करते। इस पर नर्मदा के क्षिप्रा में मिलने पर सिंहस्थ के दौरान नागा साधुओं के समक्ष स्नान का संकट है। उल्लेखनीय है,कि सिंहस्थ या कुंभ की शुरुआत नागा साधुओं व उनके अखाड़ों के शाही स्नान के बाद ही होती है। सिंहस्थ के दौरान यदि यह मुद्दा गर्माता है तो प्रशासन के समक्ष एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी। कुछ साधु इस परियोजना को लेकर अपना विरोध भी जता चुके हैं। इंदौर एयरपोर्ट के समीप पहाड़ी पर स्थित एक आश्रम में रहने वाले  महामंडलेश्वर नामदेवदास उर्फ कंप्यूटर बाबा ने गत 3 मई को अपने  साथी संतों के साथ उज्जैनी पहुंच कर विरोध जताया। इनका विरोध इन नदियों को अप्राकृतिक ढंग से जोडेÞ जाने को लेकर है।  कंम्प्यूटर बाबा कहते हैं,भाजपा खुद को हिंदू धर्म का रखवाला बताती है लेकिन उसने कुंआरी नर्मदा और विवाहित क्षिप्रा को जोड़कर बहुत बड़ा पाप किया है।  संतों ने वर्ष 2016 में होने जा रहे सिंहस्थ में भाग नहीं लेने की भी धमकी दी है।  उनका तर्क है कि उज्जैन स्थित क्षिप्रा में नर्मदा का जल मिला होगा जबकि हिंदू मान्यता के मुताबिक, सिंहस्थ में केवल क्षिप्रा के जल में डुबकी लगाने का महत्व होता है। इंदौर एयरपोर्ट के नजदीक एक पहाड़ी पर स्थित अपने आश्रम में बैठे कंप्यूटर बाबा राज्यभर के साधु-संतों को फोन लगाकर एकजुट होने का आव्हान कर रहे हैं। इनकी योजना देशभर के साधु-संतों को एकजुट कर राज्य सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने की है। उनके सहयोगी महामंडलेश्वर संतोष दास का दावा है  ,कि उज्जैन के सभी 13 अखाड़े नदियों को जोड़े जाने के खिलाफ हैं। 
इधर, नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना को लेकर प्रदेश कांग्रेस भी सवाल खड़े कर रही है। पार्टी के  प्रदेशाध्यक्ष अरूण यादव व प्रदेश प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा, अभय दुबे ने गत दिनों कहा कि यह परियोजना केवल सफेद हाथी है। मुख्यमंत्री के असाधारण दवाब के चलते नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना रिकार्ड समयावधि में 432 करोड़ रुपए खर्च कर पूरी की गई।  उसकी वास्तविक कीमत निमाड़ के किसानों को चुकाना पड़ेगी। मुख्यमंत्री ने वर्ष 2006 में उन किसानों से वादा किया था, कि ओंकारेश्वर बांध से नहरें बनाकर निमाड़ को हरि भूमि बनाएंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। उन किसानों के आंसू पोछने का समय भी सीएम के पास नहीं है। प्रवक्ताओं ने कहा कि यह योजना सिर्फ शिवराजसिंह के उतावलेपन की उपज है। इस योजना से 13 लाख रुपए प्रतिदिन का बिजली खर्च होगा। अभी पानी आ नहीं आ रहा है। राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस योजना को चालू करने की कोशिश की गई। एनवीडीए के दस्तावेजों से साफ है कि एक हजार लीटर पानी को पंप करने पर 9 रु. खर्च आएगा। ऐसे में प्रशासकीय खर्च और लीकेज को जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा 72 रु. प्रति  हजार लीटर आता है। इस कीमत पर पानी लेना किसी के लिए भी संभव नहीं है.

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