रवि अवस्थी,भोपाल। पचास करोड़ रुपए से अधिक की अघोषित आय अर्जित करने वाले भारतीय वन सेवा के अधिकारी वसंत कुमार सिंह की राजनैतिक पहुंच से उनके वरिष्ठ अधिकारी ही नहीं बल्कि सरकार भी खौफ खाती रही है। इस बात का आंकलन इसी बात से किया जा सकता है,कि मुख्यसचिव ,प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष व तमाम जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा आपत्ति किए जाने के बाद इस जूनियर अधिकारी को नियमों के विपरीत प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का सदस्य सचिव बना दिया गया। उनकी इस नियुक्ति पर हाईकोर्ट में याचिका दायर होने पर सरकार ने आनन-फानन में सिंह को बोर्ड से हटा कर वनमंत्री के गृह क्षेत्र में पदस्थ कर दिया। यहां भी 130 से अधिक वनकर्मियों को प्रताड़ित करने का मामला तूल पकड़ने पर उन्हें उज्जैन वृत्त का मुख्य वन संरक्षक बना दिया गया। जहां बुधवार को लोकायुक्त पुलिस द्वारा डाले गए छापे में इस भ्रष्ट अधिकारी की कलई खुल गई।
वर्ष 1987 बैच के भारतीय वन सेवा के अधिकारी वी के सिंह का अब तक का सेवाकाल दबंगाई व बदमिजाजी भरा रहा है। बताया जाता है,कि भाजपा के एक वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता से उनके नजदीकी संबंध होने के कारण विभाग के अधिकारी ही नहीं सरकार में बैठे राजनेता भी इस अधिकारी को नाराज नहीं करना चाहते थे। खासकर पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के कार्यकाल में तो बीपी सिंह की विभाग में तूती बोलती रही। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है,कि वर्ष 2005 में सरकार ने नियम विरुद्ध बीके सिंह को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का सदस्य सचिव बना दिया। बताया जाता है कि इस पद के लिए जिन तीन अधिकारियों के नामों की पैनल राज्य मंत्रालय को भेजी गई थी उसमें बीके सिंह का नाम नहीं था,लेकिन तत्कालीन वन मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने पैनल में शामिल शिवेन्दु श्रीवास्तव का नाम काट कर बी के सिंह का नाम जोड़ दिया। सूत्रों का दावा है कि इस पर आवास एवं पर्यावरण विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव सत्यप्रकाश ने टीप लिख कर बीके सिंह को जूनियर अधिकारी बताते हुए उक्त पद के लिए अपात्र बताया था। यहां तक कि प्रमुख सचिव की इस टीप पर तत्कालीन मुख्य सचिव विजय सिंह ने भी बीके सिंह की नियुक्ति पर सुप्रीम क ोर्ट के निर्देशों की अवहेलना होने की जानकारी शासन को दी थी,लेकिन तब के मुख्यमंत्री ने इन तमाम आपत्तियों को नजर अंदाज कर बीके सिंह को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का सदस्य सचिव बना दिया। इस महत्वपूर्ण पर आते ही बीके सिंह ने ऐसी अवैध वसूली शुरु की,कि औद्योगिक इकाईयों के संचालक परेशान हो गए। बोर्ड सचिव के आतंक से तंग आ कर पीथमपुर इंडस्ट्रीज एसोसिएशान ने तो लिखित में अपनी शिकायत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से की थी। यहां तक कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष प्रेमशंकर दुबे ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर सदस्य सचिव की कारगुजारियों से अवगत कराया व उनकी नियुक्ति का विरोध किया था। बताया जाता है,कि बोर्ड अध्यक्ष के इस पत्र पर मुख्यमंत्री सचिवालय ने कोई संज्ञान नहीं लिया और बीके सिंह सचिव बने रहे। इसी बीच एक स्वयं सेवी संस्था द्वारा इस मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। कोर्ट अपना फैसला सुनाता इससे पहले ही सरकार ने बीके सिंह को बोर्ड से हटा कर वन मंत्री सरताज सिंह के गृह क्षेत्र में आने वाले होशंगाबाद वन वृत्त में बतौर मुख्य वन संरक्षक पदस्थ कर दिया।
आईएफएस की पदस्थापना पर लगी रोक
बताया जाता है,कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में बतौर सदस्य सचिव बीके सिंह ने जो कारगुजारियां की ,इन्हें देखते हुए राज्य सरकार ने बोर्ड में किसी अन्य आईएफएस की पदस्थापना पर अघोषित रोक लगा दी है। सिंह के यहां से हटने के बाद किसी अन्य आईएफएस को बोर्ड में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ नहीं किया गया। हालांकि यह भी एक विडंबना रही कि वन अधिकारियों को जब भी किसी अन्य विभाग में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ किया गया। वहां भ्रष्टाचार के पुराने रिकार्ड टूटे। उद्यानिकी संचालनालय, आजीविका परियोजना, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग व मप्र बीज विकास निगम इसकी बानगी है। बहरहाल बोर्ड से हटने के बाद होशंगाबाद वृत्त में सीसीएफ बनाए गए बी के सिंह वहां तीन साल तक रहे। इस दौरान इस वृत्त में अवैध वन कटाई के मामले बड़ी संख्या में सामने आए। बताया जाता है कि विभाग के कुछ अधिकारी ,कर्मचारियों ने जब इसका विरोध किया तो बीके सिंह ने करीब 113 वन कर्मियों को प्रताड़ित किया। उन्होंने यहां 40 वनकर्मियों को एक साथ निलंबित करने का कारनामा भी दिखाया। सर्किल में अवैध वन कटाई की शिकायतों पर वन मुख्यालय द्वारा जबाव-तलब करने पर उन्होंने अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक सुहास कुमार तथा ए एस अहलावत से दुर्व्यवहार किया। वन अधिकारी श्री कुमार ने तो इस बात की शिकायत विभाग के आला अधिकारियों से की थी। बताया जाता है कि तब विभाग के तत्कालीन एसीएस मलय कुमार राय व पीसीसीएफ रमेश के दवे ने बीके सिंह को हटाने का मन बनाया था लेकिन वन मंत्री ने अपने अधिकारों का उपयोग कर बीके सिंह को यथावत पदस्थ रखा और शिकायत कर्त्ता अधिकारी सुहास कुमार को हटा कर अन्यत्र पदस्थ कर दिया। होशंगाबाद में शिकायतें अधिक बढने व कर्मचारियों के लामबंद होने पर बीके सिंह को उज्जैन सर्किल का मुख्य वन संरक्षक बना दिया गया। वर्ष 87 बैच का यह अधिकारी शुरुआत से ही मलाईदार पदों पर रहा। वह सीहोर व छिंदवाड़ा में लंबे समय तक डीएफओ पद पर रहे तो पदोन्नति के बाद सागर वृत्त के वन संरक्षक बने। बताया जाता है कि कांग्रेस शासन काल में भी बीके सिंह अपने राजनैतिक रसूख की दम पर करीब छह साल तक छिंदवाड़ा में डीएफओ पद पर बने रहे। तब उनके संबंध महाकौशल के एक बड़े नेता से रहे। राज्य मंत्रालय में बीके सिंह का खासा दबदबा रहा है। बताया जाता है कि होशंगाबाद वृत्त में पदस्थापना के दौरान हरदा में अवैध कटाई का मामला सामने आने पर राज्य सरकार ने इसकी जांच कराई थी। वन मुख्यालय ने इसकी रपट सरकार को भेजी थी। इस रपट में बीके सिंह के साथ ही हरदा के तत्कालीन वन मंडल अधिकारी एके जोशी की लापरवाही के आरोप लगे थे। लेकिन इस रपट के आधार पर कोई कार्रवाई हो पाती उसके पहले ही मंत्रालय से फाइल के वह हिस्से गायब हो गए जिसमें सिंह और जोशी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। बाद में वन मंत्री के हस्तक्षेप के बाद इस मामले में बीके सिंह बच गए और कार्रवाई जोशी के खिलाफ तक सीमित रह गई।
गरीब को धमका कर खरीदी जमीन
लोकायुक्त पुलिस के छापे के दौरान इस बात का खुलासा हुआ कि बीके सिंह ने ज्यादातर निवेश जमीन की खरीद-फरोख्त में किया। छापे में उनके पास भोपाल-सीहोर रोड पर दो करोड़ रुपए मूल्य का फार्म हाउस, भोपाल चूनाभट्टी क्षेत्र के जानकी नगर में एक करोड़ रुपए का बंगला, राजधानी के समीप दीपड़ी में 70 लाख रुपए की जमीन, डोडा श्यामपुर में 8 बीघा जमीन, सीहोर के समीप दोराहा में एक करोड़ रुपए मूल्य की कृषि भूमि, बनारस में थ्री स्टार होटल सूर्या व आइडियल में 3 करोड़ रुपए का निवेश, बनारस में ही होटल अजय,बुद्धा व गौतम इन्फ्रास्ट्रक्चर में एक करोड़ रुपए का निवेश, बनारस केंट में दो करोड़ रुपए मूल्य का पेट्रोल पंप, कछावन केड़ा घाट जौनपुर में दो सौ बीघा जमीन, हिसार जौनपुर के पैतृक मकान में करीब पचास लाख की लागत से निर्माण कार्य, बनारस में वरूणा पुल के पास गौतम विला में करीब दो करोड़ रुपए मूल्य का बंगला व 50 लाख रुपए कीमत का मैरिज गार्डन। बताया जाता है,कि सीहोर में पत्नी के नाम जमीन खरीदने के मामले में भी लोकायुक्त में शिकायत हुई थी। तब सिंह डीएफओ थे। तब उन पर आरोप लगे थे कि गरीब किसान को धमकाकर उसकी जमीन औने- पौने दाम पर खरीद ली गई।
निगरानी कर्त्ता, सरकार भी जिम्मेदार: दुबे
इधर, सूचना का अधिकार आंदोलन के संयोजक अजय दुबे ने कहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त पाए जाने वाला अधिकारी रातोंरात करोड़ों रुपए नहीं कमाता। इसके लिए संबंधित विभाग में मानीटरिंग का दायित्व निभाने वाले अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। आईएफएस बीके सिंह के मामले में तो साफ है कि सब कुछ जानते हुए भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर , तत्कालीन वन मंत्री राजेन्द्र शुक्ल व मौजूदा वन मंत्री सरताज सिंह चुप्पी साधे रहे। उसकी तमाम गलत कारगुजारियों के बाद भी उसकी मलाईदार पदों पर पदस्थापनाएं की। उसकी गोपनीय चरित्रावली को उज्जवल दर्शाया गया। उन्होंने कहा कि इस भ्रष्टाचार के लिए जितना जिम्मेदार उक्त अधिकारी है उससे कहीं ज्यादा सरकार में बैठे लोग हैं। उन्हें इसका जवाब देना चाहिए कि क्यों कर एक अधिकारी अवैध तरीके से अरबों रुपए कमाता रहा और वे कार्रवाई करने की बजाए उसकी मलाईदार पदों पर पदस्थापना करते रहे। उन्होंने कहा कि लोकायुक्त पुलिस से वर्ष 2001 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष बीके जैन पर भी छापा डाल कर करोड़ों की अवैध संपत्ति का खुलासा किया था लेकिन 12 साल गुजरने पर भी इस मामले में फैसला नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि लोकायुक्त को भी यह तय करना चाहिए कि भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी को जल्दी से जल्दी सजा मिल सके।
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013
भ्रष्ट वन अफसर के आगे सरकार भी रही नतमस्तक
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Ditulis Oleh : Janprachar.com Hari: 3:32 am Kategori: मध्यप्रदेश समाचार
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