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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

राघवजी का नीरस गान



रवि अवस्थी,भोपाल। चुनावी साल में प्रदेश के बजट से सौगातों की उम्मीद लगाए लोगो को निराशा होना पड़ा है। करीब 92 हजार करोड़ रुपए के इस बजट में महज रसोई गैस व नमकीन को छोड़ कर सरकार आम जन को कोई राहत नहीं दे सकी। बजट का ज्यादातर हिस्सा स्थापना व्यय  या फिर सरकार की पुरानी घोषणाओं को पूरा करने के लिए ही तय किया गया है। करों में दी गई मामूली छूट भी उद्योगपतियों के खाते में जाने से तेरहवीं विधानसभा के आखिरी बजट को नीरस माना जा रहा है। इसके चलते बजट का कोई राजनैतिक लाभ सत्त्तारुढ़ दल को मिलने के आसार नहीं के बराबर है।
 राज्य के वित्त मंत्री राघवजी गत 22 फरवरी को राज्य विधानसभा में लगातार दसवीं बार बजट पेश करने वाले प्रदेश के दूसरे वित्त मंत्री बने। इस व्यक्तिगत उपलब्धि के बाद बजट पेश करने के दौरान श्री राघव के चेहरे पर बीते सालों की तरह न तो कोई खुशी का भाव रहा न वह उत्साह। बल्कि बजट पेश करने के बाद आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान अपने स्वभाव के विपरीत वह खीझते रहे। यहां तक कि एक साधारण सवाल के दौरान उन्होंने अपनी खीझ का इजहार इस उत्तर के साथ किया कि बजट को समझाने मीडिया के  लिए अलग से क्लास लगानी होगी। आमतौर पर बजट पेश करने के बाद उत्साह से लवरेज रहने वाले वित्तमंत्री ने अपने चुनावी भाषण के दौरान भी बजट बनाने को चुनौतीपूर्ण बताया। दरअसल,यह चुनौती उन्हें अपनों से ही अधिक रही। मसलन, प्रदेश के मुखिया ने बजट पेश होने के  एक दिन पहले ही सदन में किसानों का बिजली बिल आधा माफ करने व इस पर लगाया सरचार्ज समाप्त करने की घोषणा को दोहरा कर इसका श्रेय स्वयं लेने का प्रयास किया। यही नहीं बजट में रसोई गैस पर वेट टैक्स कम किए जाने की खबर भी एक दिन पहले ही लीक हो कर सार्वजनिक हो गई। सदन में विपक्षी सदस्यों ने बजट की गोपनीयता भंग होने का आरोप लगाया। संभवतया यह पहला मौका है जब बजट को लेकर इस तरह का जोखिम उठाया गया। नतीजतन, बजट में आम आदमी को राहत देने वाली इस एक मात्र घोषणा पर भी वित्त मंत्री को वाहवाही नहीं मिल सकी। बजट में एक भी ऐसी राहत नहीं जिसे लेकर सत्तारुढ़ दल से जुड़े सदस्य अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाकर इसे उपलब्धि के रूप में गिना सकें। व्यवस्थाओं व अधिकारों  का केंद्रीयकरण होने से राज्य मंत्रिमंडल के ज्यादातर सदस्य स्वयं को बौना महसूस कर रहे हैं। गत 25 फरवरी को सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री के एल अग्रवाल के साथ  घटित वाक्या इसकी बानगी है। जब सदन में अपने विभाग से जुडेÞ प्रश्नों की समीक्षा के दौरान जीएडी सचिव अरविंद राय ने उन्हें दो टूक जवाब दे डाला। विभागीय सचिव के तेवर से बैकपुट पर आए मंत्री श्री अग्रवाल ने यह कह कर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया कि हमारा क्या हम तो आज सत्ता में हैं,कल नहीं होगें तो आप को ही ‘सर’ कह कर काम करवाना पड़ेगा। मंत्री व उनके मातहत अधिकारी  के बीच हुए इस घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि ब्यूरोक्रेसी को मंत्रियों व विधायकों की परवाह नहीं है। सत्ता में भी होते हुए  वे अपने कार्यकर्त्ताओं या आम जन के हित में कोई काम नहीं करवा पा रहे हैं।
 घोषणाएं बजट पर भारी
 यह पहला मौका है,जब राज्य का सालाना आम बजट करीब 92 हजार करोड़ रुपए का पेश किया गया। राज्य में यह अब तक का सबसे बड़ा बजट है। इसमें 62 प्रतिशत राशि प्रदेश के विकास पर व्यय करना तय की गई लेकिन इस रकम का एक बड़ा हिस्सा बीते एक दो सालों के दौरान राज्य शासन द्वारा की गई घोषणाओं  के नाम तय किया गया। मसलन, नए वित्तीय साल में  बिजली के लिए बजट में 8,856 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया,लेकिन इसमें से महज 26 सौ 81 करोड़ रुपए ही पारेषण हानि को कम करने व 29 करोड़ रुपए अपरंपरागत बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए रखे गए। वहीं शेष 70 फीसदी हिस्सा बिजली के आधे बिल माफ करने ,सरचार्ज की भरपाई या दीगर कामों के लिए रखा गया।इसमें तीन हजार करोड़ रुपए फीडर सेपरेशन के लिए तय हुए।  बिजली बिलों की माफी हो या गेहूं पर बोनस देने का मामला। इन मामलों में हितग्राही की श्रेणी तय नहीं होने से सक्षम व बड़े किसानों को इसका लाभ सर्वाधिक मिलना तय है। सरकार इसे नीतिगत फैसला बता कर चुनाव में किसानों को ललचाने का प्रयास कर सकती है,लेकिन इस तरह की खैराती प्रवृत्ति ने राज्य के कोष का बड़ा झटका दिया है। आलम यह है,कि सरकार को बाजार से हजार करोड़ का कर्ज लेने के लिए बीते पखवाड़े ही बिड जारी करनी पड़ी। जबकि राज्य पर पहले ही करीब 92 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। ज्ञात हो कि गेहूं पर दिया जाने वाला बोनस नए वित्तीय साल में सौ से बढ़ा कर डेढ़ सौ व धान पर पचास रुपए से बढ़ा कर सौ रुपए कर दिया गया है। गेहूं पर बोनस देने के लिए ही कृषि विभाग के नए  बजट में एक हजार पचास करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। वहीं 12 सौ रुपए प्रति हार्स पॉवर के फ्लैट रेट पर बिजली पंपों के लिए कनेक्शन दिए जाने की बीते माह की गई घोषणा को पूरा करने के लिए बजट में 17 सौ करोड़ का प्रावधान किया गया। इसी तरह शून्य प्रतिशत ब्याज दर  पर कृषि ऋण  के ब्याज की प्रतिपूर्ति के लिए पांच सौ करोड़ का प्रावधान किया गया। कृषि विभाग के बजट का एक बड़ा हिस्सा नई घोषणाओं के लिए प्रावधानित होने से विभागीय योजनाओं में बजट की कमी आई है। मसलन, जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए महज 12 करोड़ रुपए, फार्म मेकेनाइजेशन का प्रोत्साहित करने महज 7 करोड़ रुपए, नए 250 कस्टम हायरिंग केंद्रो की स्थापना के लिए 32 करोड़ रुपए, प्रदेश में व्यावसायिक उद्यानिकी फसलों के  लिए संरक्षित खेती को बढ़ावा देने 3 करोड़ रुपए, पचास नए पशु अस्पताल एवं 123 पुराने अस्पतालों का उन्नयन करने 18 करोड़ रुपए, आदिवासी विकास खंडों में घर पहुंच पशु चिकित्सा सेवा के लिए महज 7 करोड़ रुपए ,पशु भ्रूण प्रयोगशाला की स्थापना व उच्च उत्पादन वंशावली के बछड़े-बछड़ियां तैयार करने के लिए 4 करोड़ व प्रदेश में अनाज की भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए 55 करोड़ रुपए ही मिल सकेंगे। इसी तरह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगो को समय पर राशन मुहैया कराने के लिए नए बजट में साढ़े तीन सौ करोड़ व मछली पालन विभाग को महज 74 करोड़ रुपए से संतोष करना पड़ेगा।
 19 हजार करोड़ खर्च के बाद हालात जस के तस
 राज्य में बीते नौ सालों के दौरान सड़कों के निर्माण व रखरखाव पर करीब 19 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए ,लेकिन इस मामले में हालात अब भी जस के तस हैं।  सरकार का दावा है,कि उसने इन सालों में 90 हजार किमी से ज्यादा सड़कें तैयार की लेकिन प्रदेश में सड़क अब भी चुनावी मुद्दा बना हुआ है।  ज्यादातर जनप्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों में सड़कों की दुर्दशा को लेकर परेशान है। सत्तारुढ़ पार्टी के विधायक दल की बैठक हो या राज्य विधानसभा। प्रदेश की खस्ता हाल सड़कें व बिजली इनमें चर्चा का विषय रही हैं। नए साल में प्रदेश सरकार ने सूबे में करीब साढ़े 5 हजार किमी. लंबी सड़के,56 बड़े व मध्यम पुल व बीस रेलवे ओवर ब्रिज बनाने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए नए बजट में करीब पांच हजार करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया गया ,लेकिन यह रकम खर्च करने के लिए सरकार के पास महज तीन माह की मोहलत है। जुलाई से बारिश शुरु होने पर निर्माण कार्य संभव नहीं  तो  सितंबर-अक्टूबर में चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होने पर निर्माण कार्यो पर रोक लगना तय है। महज तीन माह में ताबड़ तोड़ तरीके से काम  कराए जाने पर भी जन अपेक्षा के मुताबिक सड़कें व पुल तैयार करवा पाना आसान नहीं होगा । इस स्थिति में सड़कें एक बार फिर सत्तारु ढ़ दल के उम्मीदवारों के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं। कमोवेश यही हालत बिजली को लेकर है। फ ीडर विभक्तिकरण के लिए बजट में करीब तीन हजार करोड़ रुपए का प्रावधान होने के बाद महज तीन माह में यह काम पूरा करा पाना आसान नहीं होगा। इससे चुनावी साल में सभी गांवों को चौबीसों घंटे बिजली देने की अवधारणा को झटका लग सकता है। राज्य में आबाद ग्रामों की तादाद 52 हजार से अधिक है। मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बीते 9 सालों में 12 सौ गांवों को ही कथित तौर पर पक्की बारहमासी सड़कों से जोड़ा जा सका। शेष के लिए दो साल का लक्ष्य तय है और इसके लिए नए बजट में पांच सौ करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई। इसी तरह  पंचायत एवं ग्रामीण विकास  विभाग की पंच परमेश्वर योजना के तहत गांवों में नाली व अंदरुनी सड़कें तैयार करने के लिए बजट में 14सौ 63 करोड़ का प्रावधान किया गया ,लेकिन बजट जिला पंचायतों को मिलने व निर्माण कार्यों के नए प्रस्ताव स्वीकृत होने में ही तीन माह बीत जाना तय है। इस  स्थिति में पंचायतों में भी नए निर्माण कार्यों की गति धीमी रहने के आसार हैं। इस तरह चुनावी साल में नए निर्माणों के लिए भूमि पूजन कार्यक्रमों की भरमार रह सकती है,लेकिन निर्माण कार्य चुनाव से पहले पूरे होना आसान नहीं होगा।  कमोवेश यही स्थिति पेयजल जैसी अहम मूलभूत सेवा को लेकर है। राज्य की अधिकतर ग्राम पंचायतों में अब भी नलजल योजनाएं लागू नहीं है। वहीं अधिकतर बसाहटों क ो नलकूप या हैंडपंप से काम चलाना पड़ रहा है। नए बजट में कहने को 11,400 बसाहटों में नलकूप खनन व 18 सौ बसाहटों में नलजल प्रदाय योजनाएं शुरु करने के लक्ष्य तय किया गया,लेकिन यह काम भी वर्षा ऋतु से पहले पूरा करा पाना आसान नहीं होगा। जुलाई बाद निर्माण कार्यो पर अघोषित रोक लगने से बसाहटों को इस साल भी शुद्ध पेयजल सुलभ हो पाना नमुमकिन होगा,यानि नया बजट से भी  प्रभावितों को तत्काल राहत मिल पाने की संभावनाएं क्षीण हैं। आबादी के मान से बजट का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण विकास पर खर्च होना स्वाभाविक है,लेकिन नए बजट में नगरीय निकायों क े लिए राज्य का नया बजट महज 5 हजार 168 करोड़ रुपए रखा गया है। इसमें भी 220 करोड़ रुपए भ्रष्टाचार की परिचायक बनी डीएफआईडी योजना के लिए रखे गए हैं। राज्य के 376 नगर,कस्बों में अधोसंरचना विकास, शहरी पेयजल योजना व स्वच्छता मिशन आदि के लिए बजट में महज 258 करोड़ रुपए का प्रावधान है,जबकि राज्य के चारों महानगरों के विकास के मामले में सरकार  केंद्र प्रवर्तित जेएनएनयूआरएम योजना पर आश्रित है। सूबे की झीलों व तालाबों के संरक्षण के लिए बजट में केवल एक करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। नए वित्तीय साल में नगरीय निकायों की कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए शहरी सुधार कार्यक्रम नामक नई योजना की शुरुआत होगी,लेकिन इस योजना पर कितनी राशि व्यय होगी। बजट में इसका खुलासा नहीं किया गया। कमोवेश इसी तरह की गोपनीयता नवगठित राष्ट्रीय अभिशासन एवं नगरीय प्रबंध संस्थान के कामकाज व बजट, शहरी क्षेत्रों के हेरीटेज स्मारकों,स्थलों व भवनों के संरक्षण व संवर्धन , केश शिल्पी कल्याण योजना, पंरपरागत कारोबार करने वालों के लिए लागू योजना ,उद्योग विभाग से संबंद्ध दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कारीडोर परियोजना, दर्जन भर जिलों में प्रस्तावित जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्रों की स्थापना ,शिक्षा,स्वास्थ्य व पर्यटन से जुड़े विभिन्न मदों को लेकर है।
व्यापारियों,उद्योगपतियों पर मेहरबान
  जमीन आवंटन की बात हो या कर वसूली। बीते सालों क े वित्तीय प्रबंधन को देखा जाए तो राज्य शासन व्यापारियों, उद्योगपतियों व ब्यूरोके्रटस पर खासी मेहरबान रही है। इस बात का खुलासा नियंत्रक महालेखा परीक्षक की पिछली रिपोर्ट में भी किया गया है। केग की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2011 तक प्रदेश में करीब 877 करोड का राजस्व बकाया था । इसमें से 685करोड का बकाया पांच साल पुराना है। यह बकाया राशि गरीब या प्राकृतिक आपदा ग्रस्त किसानों पर नहीं बल्कि खनन व शराब का कारोबार करने वाले धनाढ़यों पर बकाया है। इसमें आबकारी के 57 करोड, बिजली के 15 करोड, खनन के 12.38 करोड, सहकारिता के 119.33 करोड, मनोरंजन कर के 58 लाख, वाणिज्यिक कर के 530 करोड, व मुद्रांक शुल्क व पंजीयन शुल्क के करीब 70 करोड रु शामिल है। इसका खुलासा केग की अगली रिपोर्ट में हो सकेगा। इसी तरह ब्यूरोक्रेटस से हिसाब किताब लेने के मामले में भी सरकार काफी उदार रही। इसी रिपोर्ट में कहा गया कि मार्च 2011 तक राज्य विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने करीब 943 करोड़ रुपए बतौर एडवांस लिए और इसका कोई हिसाब सरकार को नहीं दिया। दो साल पहले तक इस तरह के प्रकरणों क ी संख्या 2463 थी। इनमें 278 मामले दस साल पुराने, 225 ,5से 10 साल , 682 मामले 1से 5 साल  व 1278 मामले एक साल से कम अवधि के हैं।
इसी तरह विभागीय गबन व हानि के 49 करोड़ रुपए की वसूली प्रस्तावित होने के बाद सरकार आरोपी अधिकारी,कर्मचारियों से एक रुपया नहीं वसूल सकी।  विकास कार्यों में खर्च होने वाली राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र देना भी जरूरी होता है,लेकिन 42 हजार से अधिक प्रकरणों में विभागों ने यह प्रमाण पत्र ही सरकार को नहीं दिए। यह रकम 16 हजार करोड़ रुपए से अधिक है। करीब 808 करोड़ रुपयों के लेखों का मिलान ही विभागों ने नहीं किया व दो हजार करोड़ रुपए से अधिक रकम मध्यप्रदेश कोष संहिता के नियमों के विपरीत व्यैक्तिक खातों में जमा रखे गए। यह समूची स्थिति मार्च 2011 तक की है। बीते दो सालों में इस तरह के मामलों में और अधिक इजाफा हुआ है। बजट में मिलने वाली राशि या वसूली में ही गड़बड़ी नहीं बल्कि बजट मांगने में भी प्रशासनिक लापरवाही के मामले केग की रिपोर्ट ने उजागर किए। इसमें कहा गया कि  वित्तीय  वर्ष 2010-11 में 73,437 करोड के बजट के विरुद्ध साल में केवल 61,228 करोड खर्च हुए। 12,209 करोड की इस बचत के  बाद भी सरकार 14,479 करोड का अनुपूरक बजट लाई। अनुपूरक बजट मांगने पर विभागों ने जिस तरह की आपाधापी दिखाई। कुशल वित्तीय प्रबंधन की दृष्टि से इसे उचित नहीं माना जा सकता है। केग ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया कि  बजट में अनुदानों के विवरण पत्रक के एक दर्जन से अधिक मुख्य शीर्ष मांगों में करीब 166 करोड़ रुपयों के खर्चे को गलत तरीके से वर्गीकृत दर्शाया गया। इसी तरह वर्ष 2010-11 के बजट भाषण में वित्त मंत्री राघव जी ने  राज्य के दस जिलों में राष्टीय स्वास्थ्य बीमा योजना लागू करने की घोषणा करते हुए 60 करोड़ रुपए  का प्रावधान किया लेकिन साल भर में एक रुपया भी इस योजना पर खर्च नहीं किया गया। स्वास्थ्य विभाग ने करीब 11 करोड़ रुपए दूसरे मदों में उपयोग कर लिए व शेष राशि साल के आखिर में लेप्स हो गई। इस तरह के कमजोर वित्तीय प्रबंधन के चलते सरकार की माली हालत खस्ता रही और उसे कर्ज लेकर काम चलाना पड़ रहा है।


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