वीआईपी सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के तीखे तेवर व केंद्र सरकार समेत राज्यों से इसका ब्यौरा मांगे जाने से प्रदेश का गृह विभाग पसोपेश में है। ‘माले मुफ्त दिल- ए -बेरहम' की तर्ज पर राजनेताओं को मुहैया कराई गई सुरक्षा के मामले में उससे जवाब नहीं सूझ रहा है। सुरक्षा मामलों की तिमाही समीक्षा करने वाले गृह विभाग ने इस मामले में पुलिस मुख्यालय से ब्यौरा तलब किया है। दरअसल,राज्य को इस मामले में आगामी 14 मार्च तक जवाब न्यायालय में पेश करना है। पुलिस मुख्यालय अगर सुरक्षा की हकीकत बयां करता है तो संभव है कि भविष्य में उसे राजनेताओं की सुरक्षा में कटौती करना पड़े और नेताओं के संरक्षण व इशारे पर काम कर रहे अधिकारी यह जोखिम लेने को तैयार नहीं।
स्टेटस सिंबल बनी सुरक्षा
वीआईपी सुरक्षा घेरा केवल नेताओं तक ही सीमित नहीं है। इसमें नौकरशाह, न्यायाधीश, खिलाड़ी और अभिनेता भी शामिल हैं। समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने का जिम्मा लिए और सांसारिक मोह-माया छोड़े कुछ भगवाधारी संन्यासी भी इस सुरक्षा कवच से घिरे हैं। संसार को नश्वर बताने वाले कई बाबा भी अपने नश्वर शरीर की सुरक्षा के लिए आम जनता के खून पसीने की कमाई को झूठी शान-शौकत पर उड़ा रहे हैं। प्रदेश में भी अपने साथ बंदूकधारी पुलिस कर्मी तैनात रखना राजनेताओं के लिए स्टेटस सिंबल बन गया है। मंत्री ही नहीं सभी विधायकों को गनमेन की सुरक्षा मुहैया कराई गई है। वहीं मंत्रियों के बंगलों पर करीब नौ सुरक्षा कर्मियों का दस्ता हर वक्त तैनात रहता है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी दलों के जनप्रतिनिधियों को पुलिस की यह सेवा सुलभ है। यही नहीं प्रमुख विपक्षी दल के कुछ प्रमुख नेताओं के रिश्तेदारों को भी सरकार ने सुरक्षा मुहैया करा रखी। सूत्रों के मुताबिक, राज्य में करीब दो हजार से अधिक पुलिस कर्मी नेताओं यानि वीआईपी की सुरक्षा में तैनात है। इनमें आठ सौ से अधिक पीएसओ यानि बंदूक धारी सुरक्षा कर्मी हैं। नेताओं की सुरक्षा मामले में विशेष सशस्त्र बल व जिला पुलिस दोनों ही बलों के पुलिस कर्मियों की सेवाएं ली जा रही है। जबकि आम आदमी की सुरक्षा को लेकर पुलिस महकमा बल की कमी का बहाना बनाता रहा है। पुलिस कर्मियों की सेवाओं का दुरुपयोग केवल नेता ही नहीं प्रशासनिक सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारी भी कर रहे हैं। पुलिस मुख्यालय में ही करीब डेढ़ सौ से अधिक अर्दली बेगारी करने को मजबूर है। यह पद क भी गुलाम भारत में तत्कालीन अंग्रेज शासको ने निर्मित किया था। इसे पुलिस महकमे ने बदस्तूर जारी रखा। पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट में यानि कागजी तौर पर अर्दली का कोई पद स्वीकृत नहीं होने से इस पद पर सेवाएं देने वालों के लिए पदोन्नति के कोई अवसर नहीं है, न ही उसकी सेवाओं का कोई दैनिक समय ही निर्धारित है। यही नहीं अर्दलियों के अलावा एक-एक पुलिस अधिकारी के निवास पर आठ से दस पुलिस कर्मी उनके गृह कार्यों के लिए तैनात किए गए हैं। इनके अलावा फटिक के नाम पर जिला पुलिस लाइनों से भी पुलिस कर्मियों को बेगारी करने के लिए जब-तब बुलाया जाता है। एक भुक्तभोगी पुलिस कर्मी की बात पर यकीं किया जाए तो उन्हें अधिकारियों के घरेलु कामकाजों के अलावा जरुरत पड़ने पर अधिकारी के बीमार परिजनों को अपना खून भी देना पड़ता है। इस तरह शारीरिक श्रम ही नहीं दैहिक शोषण भी इस बेगारी में शामिल है।
पेड सुरक्षा सेवा योजना ठप
राज्य में पुलिस सुरक्षा के बढ़ते शौक को देखते हुए पुलिस मुख्यालय ने वर्ष 2005 में पेड सुरक्षा सेवा योजना शुरु की थी। इसका उद्देश्य भी स्टेटस सिंबल बनती जा रही सुरक्षा पर अंकुश लगाना था। इसके तहत अपात्र व्यक्ति द्वारा पुलिस सुरक्षा मांगे जाने पर उससे निर्धारित शुल्क लिया जाना तय हुआ था। बताया जाता है,कि राजनेताओं के विरोध व सरकार की दरियादिली के चलते योजना फाइलों में दफन होकर रह गई। आलम यह ,कि प्रदेश भर में महज दस गैर वीआईपी व्यक्तियों को पुलिस विभाग ने विशेष सुरक्षा मुहैया कराई लेकिन इनसे भी अब तक तय शुल्क नहीं वसूला गया। इनमें रीवा के एक बहुचर्चित एवं विवादित सीमेंट उद्योगपति भी शामिल हैं। इधर,सुप्रीम कोर्ट द्वारा वीआईपी सुरक्षा व लाल-पीली बत्ती के पात्र लोगों की सूची तलब किए जाने पर पुलिस मुख्यालय अब कुछ लोगो की सुरक्षा में कटौती करने पर विचार कर रहा है। इनमें दो विश्वविद्यालयों के कुलपति भी शामिल हैं।
दलाली में जुटे सुरक्षा कर्मी
देश भक्ति जन सेवा का संकल्प लेकर पुलिस सेवा में कुछ पुलिस कर्मी विभाग की इस दरियादिली का फायदा उठाने से भी नहीं चूकते। राजनेताओं से घनिष्ठता का लाभ उठा कर कुछ पुलिस कर्मी संबंधित नेता से उनकी सुरक्षा सेवा के लिए अपने नाम की सिफारिश विभाग को करवाते हैं। बाद में यही पुलिस कर्मी नेताओं के लिए दलाल की भूमिका अदा करने से भी नहीं चूकते। राजधानी में ही ऐसे पुलिस कर्मी लंबे समय से नेता विशेष की सेवा में तैनात हैं। उनकी पहचान पुलिस कर्मी की बजाए नेताओं के निज सचिव के रूप में बन गई है। नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री बाबूलाल गौर क ी निजी सुरक्षा में तैनात एक पुलिस कर्मी इसकी बानगी है। बताया जाता है,कि लंबे समय से एक ही नेता क ी सुरक्षा में तैनाती के चलते कुछ पुलिस कर्मियों ने खासी चल-अचल संपत्ति भी अर्जित कर ली है। जानकार सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश के अनेक नेता भले ही राजनीति में किनारा पकड़े हों लेकिन उनकी सुरक्षा अब भी मुख्यधारा की है। बताया जाता है,कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने वाले प्रदेश के कुछ नेताओं को प्रदेश में ही नहीं राज्य के बाहर भी सुरक्षा बल प्रदेश पुलिस से मुहैया कराए गए। इनमें के न्द्रीय मंत्री कमलनाथ,कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुरेश पचौरी,कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह समेत अन्य नेता शामिल हैं। जो केंद्र एवं राज्य दोनों से ही सुरक्षा सेवाएं ले रहे हैं।
आम आदमी की सुरक्षा भगवान भरोसे
वीआईपी सुरक्षा को लेकर राज्य में ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी आश्चर्य जनक हालात हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में एक लाख की आबादी पर 122 पुलिसकर्मी हैं। देश के करीब 33-35 फीसदी पुलिसकर्मी किसी न किसी रूप में अति विशिष्ठ लोगों यानी वीवीआईपी की सुरक्षा में तैनात हंै,लेकिन अति विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर सरकार काफी संजीदा है। अधिकृत जानकारी के अनुसार इस वक्त देश में 31 वीआईपी जेड प्लस, 68 जेड श्रेणी, 235 वाई और 67 विशेष व्यक्तियों को एक्स श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है। इसके साथ ही 312 लोगों को वैधानिक पदों पर होने की वजह से सुरक्षा दी जा रही है। करीब 200 करोड़ रुपए के बजट से एनएसजी लगभग 250 से अधिक वीआईपी को सुरक्षा प्रदान करती है। लगभग 200 करोड़ के बजट से ही स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री और अन्य एक दर्जन वीआईपी को सुरक्षा कवच प्रदान करता है। जेड-प्लस सुरक्षा प्राप्त नेताओं की हिफाजत के वास्ते करीब 36 जवान एक साथ तैनात होते हैं। जबकि अन्य श्रेणियों में बल की संख्या कुछ कम होती है। इस तरह राजनेताओं क ी सुरक्षा में बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है जबकि आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2010 में 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 16,778 विशिष्ट व्यक्तियों की हिफाजत में 50,059 पुलिसकर्मी छह माह से अधिक समय तक तैनात थे, जबकि मंजूरी महज 28,298 पुलिसकर्मियों के लिए ही थी। यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं, जिसके अनुसार तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या आवंटित सुरक्षाकर्मियों की संख्या से दोगुनी है। केंद्रीय गृह मंत्री की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षित लोगों की हिफाजत का अमला अमूमन उपलब्ध संसाधनों से हासिल किया जाता है। ऐसा इस मकसद के लिए मंजूरी क्षमता में इजाफे के बगैर ही होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आवंटन से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती ने मानव संसाधन की कमी से जूझ रहे राज्य पुलिस बलों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। रिपोर्ट में सुझाव के तौर पर कहा गया है कि वीआईपी सुरक्षा में पुलिसकर्मियों की तैनाती की नियमित समीक्षा की आवश्यकता है। ब्यूरो आॅफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की ओर से तैयार इस रिपोर्ट के अनुसार, 1 जनवरी 2011 तक प्रति एक लाख आबादी पर पुलिसकर्मियों की मंजूर संख्या 173.51 थी, जबकि एक लाख जनसंख्या की सुरक्षा के लिए असल में औसतन तैनात पुलिसकर्मी 131.39 थे। वहीं साल 2009 में 17,451 वीआइपी के लिए 47,355 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, जबकि मंजूरी लगभग इसके आधे के करीब 23,637 जवानों की ही दी गई थी। 2010 में बिहार में 3030, पंजाब में 1685 व प. बंगाल में 1640 विशिष्ट लोगों को सुरक्षा दी गई। आलम यह,कि वर्ष 2010 में विशिष्ट लोगों को सुरक्षा देने के लिए पंजाब से 5410 ,नईदिल्ली से 5001,आंध्र प्रदेश से 3958 व मध्यप्रदेश से करीब पांच सौ पुलिस कर्मी केंद्र को बुलाना पड़े थे।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
नईदिल्ली में गत दिनों घटित गैंगरेप वारदात के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी की सुरक्षा को लेकर सख्त रुख अख्तियार किया है। देश में सुरक्षा के दुरुपयोग को लेकर न्यायालय ने केंद्र सरकार के साथ ही सभी राज्य सरकारों से भी इस मामले में कैफियत मांगी है। कोर्ट ने वीवीआईपी ,वीआईपी की सुरक्षा में लगे बल के साथ ही लाल,पीली बत्ती की पात्रता वाले व्यक्तियों की जानकारी तलब की है। उसने वीआईपी काफिले की वजह से यातायात अवरुद्ध किए जाने का ब्यौरा मांगकर सरकार के समक्ष समस्या खड़ी कर दी है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने वीआईपी सुरक्षा की आड़ में चल रही धांधली पर जो रुख अख्तियार किया वह आखिर तक कायम रहा तो इस सुविधा का लाभ उठा रहे हजारों तथाकथित वीआईपी सामान्य जन बन कर रह जाएंगे।


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