रवि अवस्थी,भोपाल। पंचायती राज व्यवस्था में निर्माण कार्यों को लेकर की जा रही व्यवस्था परिवर्तन ने पंचायतों में भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म कर दी है,लेकिन इससे सरपंचों के हाथ बंध गए हैं। वे अब केवल ‘नाम के सरपंच’ हैं। इस बदलाव से पंचायत की सत्ता गांव से खत्म होकर एक बार फिर जिला पंचायतों यानि सरकार के हाथ में पहुंच गई है। सरपंचों का मानना है,कि यही हालात रहे तो भविष्य में पंचायतों के चुनाव लड़ने वालों का टोटा होगा।
क म्प्युटरीकरण के दौर में प्रशासनिक कामकाज में आ रही पारदर्शिता ने सरपंचों के होश उड़ा दिए हैं। सरकारी धन को कल तक अपनी मर्जी से खर्च करने वाले सरपंच अब सौ रुपए भी गैर विकास कार्यों पर खर्च करने की स्थिति में नहीं है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी यानि मनरेगा के शुरुआती दौर में राज्य में हुए व्यापक भ्रष्टाचार ने केंद्र ही नहीं राज्य शासन को भी सकते में डाल दिया। करीब आधा दर्जन जिलों में 26 सौ से अधिक दागियों के नाम सामने आने पर बदनामी के डर से सरकार ने इनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई तो नहीं की अलबत्ता व्यवस्था में बदलाव के लिए बाध्य जरूर कर दिया। ग्राम पंचायतों को ई-पंचायत में तब्दील करने की प्रक्रिया इसी बदलाव की एक अहम कड़ी है। दूसरा बड़ा बदलाव पंचायतों में क्रियान्वित तमाम योजनाओं को एक जाई कर इन्हें पंच परमेश्वर योजना में शामिल करना है।
बस नाम के सरपंच
विकास कार्यो के लिए बनाई गई इस अभिनव योजना में कामकाज का दायरा सीमित और बजट एक मुश्त रखा गया। वह भी पंचायत की आबादी के मान से। मसलन, दो हजार तक की आबादी वाली पंचायत को पांच लाख रुपए सालाना और दो से पांच हजार तक 8 लाख, 5 से 10 हजार तक 10 लाख व इससे अधिक आबादी वाली पंचायत को 15 लाख रुपए तक का बजट। पहले चरण में इस योजना के तहत गांव में सीमेंटेड सड़कें,नालियां व दो सौ वर्गफीट का ई-पंचायत कक्ष बनवाने भर का प्रावधान है। इस तरह पंचायत को उसकी आबादी के मान से मिले कुल बजट से केवल उक्त तीनों ही काम किए जा सकते हैं। इस बजट का महज दस फीसदी ही विविध कामों पर खर्च किया जा सकता है। यह राशि गत 21 जनवरी को संपन्न महापंचायत में बढ़ा कर बीस प्रतिशत की गई। पंचायतों को मिलने वाला बजट क ा अब केवल एक बैंक खाता है। जबकि पूर्व में अलग-अलग योजनाओं के खाते अलग-अलग होने से इनमें होने वाली गड़बड़ी को पकड़ पाना आसान नहीं होता था। न ही दर्शाए गए काम पता चल पाता था न खर्च की गई राशि का। यही नहीं पंच परमेश्वर में विविध मद से15 सौ से अधिक रकम खर्च करने पर इसका भुगतान क्रास चेक,बैंक ड्राफ्ट या ई नेटवर्किग के माध्यम से करना आवश्यक किया गया है। पंचायतों के लिए दुधारु गाय बनी मनरेगा को भी पंच परमेश्वर में शामिल किया गया है। इससे एक तो गांव के विकास के लिए केंद्र प्रवर्तित बजट राज्य को मिला। दूसरे मनरेगा में व्यय होने वाली राशि के एक-एक रुपए का हिसाब सबके सामने है। इससे गांव में विकास कार्य जमीं पर नजर आने लगे। वहीं गड़बड़ी की गुंजाइश भी नगण्य हुई।
अब और कसावट
नए वित्तीय वर्ष से पंचायतों में पारदर्शिता के लिए नियमों का और कड़ा बनाया जा रहा है। इसमें मुख्य है,मस्टर रोल के नाम पर होने वाली धांधली को रोकना। नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक,पंचायतों क ो अब प्रस्तावित निर्माण कार्य के लिए मजदूरों के नामों व उनके खाता नंबरों की सूची कार्य की स्वीकृति से पूर्व जिला पंचायतों को उपलब्ध करानी होगी। पंचायतें केवल तय शुदा निर्माण कार्य व ठेकेदार का चयन करेंगी । मजदूरी व ठेकेदार का भुगतान सीधे जिला पंचायत द्वारा संबंधित के बैंक खाते में किया जाएगा। इन नए दिशा-निर्देशों ने सरपंचों के माथे पर चिंता की लकीरें खीच दी है। उनकी समस्या यह कि संबंधित श्रमिक के ऐन वक्त पर गैर हाजिर रहने पर कामकाज तो प्रभावित होगा ही भुगतान को लेकर भी झंझटें खड़ी होगी। संबंधित श्रमिक के बदले में काम करने वाले दूसरे व्यक्ति को भुगतान करने के लिए सूचीबद्ध मजदूर की मान- मनौव्वल करना सरपंच व सचिव की मजबूरी होगी।
जनपद पंचायतें हुई बायपास
बदलाव की इस समूची प्रक्रिया में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की अहम् कड़ी माने जाने वाली जनपद पंचायतें आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह ‘बायपास’ हो गई हैं। मसलन, ग्राम पंचायतों में होने वाले विकास कार्यो का समूचा खाका पंचायत व जनपद तैयार करेंगे,लेकिन भुगतान के तमाम अधिकार जिला पंचायतों के हाथ में होगें। यह भुगतान भी सीधे बैंक खातों में किया जाना है,लिहाजा छिटपुट कमीशन को छोड़, किसी बड़ी गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं के बराबर या आसान नहीं है।
नहीं है अतिरिक्त आय
पंचायतों को अपनी आय बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के करारोपण का अधिकार है। इनमें जल कर,संपत्ति कर ,कांजी हाउस से होने वाली आय,प्रकाश कर आदि शामिल हैं,लेकिन ज्यादादर पंचायत करारोपण से बचती है। इसकी एक बजह तो यह कि पंचायत प्रतिनिधि कर वसूल कर ग्रामीणों से बुराई नहीं लेना चाहते। वहीं दूसरी ओर संसाधनों की कमी के चलते पंचायत का प्रशासनिक कामकाज संभालने वाले सचिवों में भी कर ढांचा तैयार करने की इच्छाशक्ति का अभाव है। जल कर मामले में ही ज्यादातर पंचायतें ग्रामीण को स्वच्छ पेयजल मुहैया नहीं कर पा रही हैं। एक तो सभी पंचायतों में यह योजना लागू नहीं है। जहां है वहां भी बिजली बिलों का भुगतान नहीं होने से योजना ठप है। संपत्ति कर वसूलने की परंपरा ही पंचायतों में नहीं रही। बिजली की अनुपलब्धता के रहते लोगो को घर में बिजली नहीं मिल रही तब स्ट्रीट लाइट का रोशन होना दूर की बात है। ऐसे में प्रकाश कर नहीं मिल पाता। कांजी हाउस की दरें 28 साल पुरानी महज 10 रुपए प्रति मवेशी है। इतने कम बजट में आवारा पशुओं को कांजी हाउस में बंद करना पंचायत के लिए महंगा सौदा साबित होता है। इसके चलते पंचायतें इस कार्रवाई से भी बचती हैं। इस तरह एक ओर सरकारी बजट के खर्चे में कसावट तो दूसरी ओर पंचायत की अपनी कोई अतिरिक्त आय नहीं होने से सरपंची अब केवल नाम की रह गई है। मानदेय में पांच गुना इजाफा कर सरकार ने सरपंचों को साधने की कवायद की है,लेकिन पिछली महापंचायत में पंचों के लिए की गई मानदेय की घोषणा से पांच लाख से अधिक पंच नाराज हैं। दरअसल, राज्य शासन ने इन्हें प्रति बैठक सौ रुपए या अधिकतम 6 सौ रुपए सालाना देने की घोषणा की। ऐसे में कोई पंच यदि सभी मासिक बैठक में शामिल भी होता है तो उसे प्रति बैठक महज पचास रुपए ही मिल सकेगें और वे इस घोषणा को ‘लालीपॉप’ बता रहे हैं। वहीं मजदूरी भुगतान प्रक्रिया में किए गए बदलाव ने सरपंचों की मुसीबत बढ़ा दी है। समीपस्थ औबेदुल्लागंज विकासखंड अंतर्गत आने वाली धामधूसर पंचायत के सरपंच गणेशराम कहते हैं,सरपंची अब आसान नहीं है। नई व्यवस्था ने सरपंच के हाथ बांध रखे हैं। जबकि लोगो का पूर्वाग्रह कुछ ओर है। आम धारणा यही है, कि सरपंच साहब बढ़िया हाथ बना रहे हैंलेकिन हकीकत कुछ ओर है। यही हाल रहा तो भविष्य में लोग सरपंच का चुनाव लड़ने से पहले दस बार सोचेंगे। इसी विकासखंड की नांदौर पंचायत के सरपंच माखन सिंह का मानना है,कि किसी भी निर्माण कार्य के लिए मजदूरों के नाम पहले तय करने से आए दिन की नई झंझटें खड़ी होंगी। वह कहते हैं,व्यवस्था में बदलाव से विकास कार्यों में तेजी आई है। यह प्रसन्नता की बात है। वहीं सराकिया पंचायत के सरपंच गौतम सिंह का मानना है,कि ईमानदारी से काम करने वालों के लिए नई व्यवस्था में कोई दिक्कत नहीं है। समस्या निष्क्रिय प्रतिनिधियों को हो सकती है। बीलखेड़ी पंचायत के सरपंच लाखनसिंह का मानना है कि पंच परमेश्वर योजना के आने से गांव-गांव में पक्की सड़कें तो बनने लगी। फिर नाली निर्माण व आंगनवाड़ी भवन बनाने का भी इसमें प्रावधान है। ई-पंचायतें होेने से पारदर्शिता बढ़ेगी। यह सरपंचों के लिए ही बेहतर है। जो नियमों की अधिक जानकारी नहीं होने के कारण धारा 40 के फेर में आ जाते हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी सरपंचों की इस समस्या से वाकिफ हैं। वह कहते हैं, पंचायतों के हिसाब-किताब में थोड़ी बहुत कमी रहने के कारण धारा 40 के अंतर्गत कार्रवाई का खतरा बना रहता है, अब इसे समाप्त कर दिया जायेगा। पंचायतों के लिये लेखापाल की व्यवस्था की जायेगी और विकास कार्यों के आंकलन के लिये जूनियर इंजीनियर की कमी को भी चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जायेगा। मजदूरी के भुगतान की प्रक्रिया में सुधार कर विकासखंड स्तर पर भुगतान की व्यवस्था की जाएगी। वह कहते हैं, चुनी हुई पंचायतें सर्वोपरि हैं। सरपंच पूरे मान-सम्मान व गरिमा के साथ काम करें। इसके लिए जो प्रशासनिक बाधाएं अब तक आती रहीं है ,उन्हें दूर किया जाएगा। इसी क्रम में सरपंचों को 5 लाख रुपए लागत तक के विकास कार्य स्वीकृत करने के अधिकार को बढ़ाकर 10 लाख रुपए किया गया है। पंचायत भवन निर्माण की लागत राशि 15 लाख रुपए करने के साथ ही पंचायत को मिलने वाले बजट की अनाबद्ध राशि 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत की गई है। ई-पंचायतें होने से सरपंचों से सरकार का सीधा संवाद बना रहेगा।
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इनके लिए सरपंची बनी मुसीबत
चुनावी साल में राज्य सरकार एक ओर सरपंचों के मानदेय व अधिकारों में इजाफा कर उन्हेंखुश करने के मूड में है तो दूसरी ओर ऐसे मामले भी सामने आए जब सरपंचों के अशिक्षित या नियमों के जानक ार नहीं होने का फायदा उठा कर उन्हें गबन के झूठे मामलों में फंसा दिया गया। जिम्मेदार राजस्व अधिकारी भी पीड़ित सरपंचों की मदद करने की बजाए अपने आकाओं को खुश करने में लगे हैं। ऐसे में पंचायत जनप्रतिनिधियों की महापंचायत बेमानी साबित हो रही है। नरसिंहपुर जिले की सांईखेड़ा जनपद पंचायत अंतर्गत सिरसिरी ग्राम निवासी 50 वर्षीय सरदार सिंह किरार तीन साल पहले अपने ही गांव की पंचायत के सरपंच चुने गए। उनकी जीत गांव के ही कुछ लोगो को रास नहीं आई। किरार पर दबाव बनाने की खातिर उनके खिलाफ पंचायत निरीक्षक ने जांच की व क थित गड़बड़ियों को आधार बना कर उन्हें धारा 40 के तहत सरपंची से अपदस्थ करने व सरपंच सचिव से ढाई लाख रुपए से अधिक की वसूली क ी सिफारिश की। हैरत की बात यह ,कि सांईखेड़ा जनपद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी आर आर आथनकर ने मामले की अपने स्तर पर कोई जांच नहीं की और निरीक्षक की रिपोर्ट को ही आधार मान कर मामला नरसिंहपुर एसडीएम के न्यायालय को सौंप दिया गया। एसडीएम ने भी तथ्यों के परे सरपंच के खिलाफ अपना फैसला दिया और अब सरपंच का मामला जिला कलेक्टर की अदालत में विचाराधीन है। यहां से हाल ही में सरपंच के स्थगन आवेदन को खारिज कर कमिशनरी या हाईकोर्ट में अपील करने की मौखिक सलाह दी गई। श्री किरार के मुताबिक, गांव के ही कुछ लोगो से उनका दो साल पहले झगड़ा हुआ था। यह मामला न्यायालय में है। इस प्रकरण में राजीनामा करने का दबाव बनाने के लिए ही एक प्रभावशाली भाजपा नेता के इशारे पर उनकी सरपंची को गलत तरीके से दाव पर लगाया जा रहा है। दरअसल, झगड़े के मामले में आरोपी उक्त नेता के रिश्तेदार हैं। श्री किरार ने बताया,कि अधिकारियों पर भाजपा नेता के दबाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है,कि इस मामले में पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव द्वारा की गई मध्यस्थता भी बेअसर रही। यहां तक कि उनके निर्देशों के विपरीत पंचायत भवन को पंचायत की मर्जी के खिलाफ दूसरी जगह बनवाया जा रहा है।
गलती सचिव की आरोप सरपंच पर
प्रशासनिक अधिकारी पंचायत जनप्रतिनिधियों को किस तरह अपने जाल में उलझाते हैं,यह प्रकरण इसकी बानगी है। अव्वल तो जांच कर्त्ता ने सरपंच सचिव को सुनवाई का कोई मौका ही नहीं दिया गया। गांव के चंद लोगो से मिल कर तैयार की गई रिपोर्ट में जो आरोप लगाए गए वे भी काफी चौंकाने वाले हैं। जांच प्रतिवेदन में कहा गया ,कि पंचायत में नियमित बैठक नहीं हुई। व्यय की गई राशि की केश बुक नहीं लिखी गई। जांच के दौरान जांचकर्त्ता को केश बुक मुहैया नहीं कराई गई। इससे ऐसा प्रतीत होता है,कि निर्माण कार्यों के लिए बैंक से आहरित करीब ढाई लाख रुपए का गबन हुआ ,लिहाजा सरपंच सचिव के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। निरीक्षक की इस रिपोर्ट को बिना परखे ही राजस्व न्यायालय को सौंप दिया। जब न्यायालय में उनके बयान की बारी आई तो उन्होंने लिखित तौर पर यह स्वीकार किया कि उन्होंने मौके पर कोई अनियमितता नहीं देखी, महज निरीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर ही सरपंच के खिलाफ धारा चालीस की कार्रवाई करने की अनुशंसा की है।
विभागीय अधिकारी एक मत नहीं
किरार के खिलाफ की जा रही इस कार्रवाई में विभागीय जिम्मेदार तकनीकी अधिकारी व जांच कर्त्ता निरीक्षक ही एक मत नहीं है। विभाग के ही उपयंत्री कार्यपालन यंत्री व आडीटर बीते दो सालों के दौरान पंचायत में हुए निर्माण कार्यों व व्यय की पुष्टि करते हैं। यहीं नहीं निर्माण कार्यों की तकनीकी व प्रशासकीय स्वीकृति व व्यय कार्य उपरांत इसके भुगतान की स्वीकृति तय नियम प्रक्रियाओं के तहत जिम्मेदार अधिकारियों ने ही दी,लेकिन किरार को दंडित करने की नीयत से इन दस्तावेजों को नजरअंदाज कर दिया गया। पीड़ित सरपंच ने बताया,कि एसडीएम न्यायालय को उन्होंने संबंधित दस्तावेजों की छायाप्रतियां मुहैया कराई लेकिन एसडीएम ने उनसे मूल दस्तावेज मांगे,जबकि वह यह बेहतर तरीके से जानते हैं कि तकनीकी मूल दस्तावेज सरपंच या किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के पास न होकर संबंधित अधिकाारियों के अधिपत्य में होते हैं। कैश बुक लिखने व बैठक बुलाने के तमाम प्रशासकीय कार्यों का दायित्व पंचायत सचिव का है न कि सरपंच का। यह बात मुख्यकार्यपालन अधिकारी ने भी अपने कथन में दर्ज कराई। किरार ने कहा कि जिस राशि के गबन का आरोप उन पर लगाया जा रहा है। इसमें करीब 63 हजार रुपए तो संबंधित जांच कर्त्ता निरीक्षक ने ही उस वक्त बैंक से आहरित किए जब उनके पास पंचायत का प्रशासकीय प्रभार था। एक अन्य आरोप पेंशनधारियों को समय पर नियमित पेंशन नहीं देने का लगाया गया,जबकि मुख्यकार्यपालन अधिकारी ने ही अपने लिखित कथन में यह बात स्वीकार की,कि आमतौर पर पेंशन की राशि नियमित तौर पर जिले को नहीं मिलती है। इसमें कई बार दो से तीन माह का समय भी लग जाता है। यह राशि उपलब्ध होने पर ही इसे पंचायतों को आवंटित किया जाता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया ,कि प्रशासकीय कार्य संबंधी दस्तावेज सचिव व अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के अधिपत्य में होते हैं न कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि के पास। बावजूद इसके एसडीएम उनसे मूल दस्तावेज की मांग करते रहे। किरार ने बताया कि उन्होंने संबंधित दस्तावेजों की छायाप्रतियां भी अपने बचाव में पेश की लेकिन इन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि निर्माण कार्यों की तकनीकी,प्रशासकीय स्वीकृति व इनके पूर्ण होने पर किए जाने वाले तमाम दस्तावेज विभाग के पास मौजूद हैं। इनमें किसी भी प्रकार की त्रुटि का उल्लेख नहीं है,लेकिन प्रशासकीय कमियों का दोष उनके सिर मढ़ने की कोशिश की जा रही है। यही नहीं इस निर्णय को आधार बना कर उन्हें पंचायत से बेदखल कर सरपंच का प्रभार एक पंच को सौंप दिया गया,जबकि यह प्रकरण अब जिला कलेक्टर क ी अदालत में विचाराधीन है।
सरपंच को हटाया, सचिव कार्यरत
इस समूचे प्रकरण में एकतरफा कार्रवाई किए जाने का आंकलन इसी बात से किया जा सकता है कि एसडीएम के फैसले में कथित गबन के लिए सरपंच व सचिव दोनों को संयुक्त रुप से दोषी ठहराया गया। जांच कर्त्ता की रिपोर्ट पर उन्हें तो अपने पद से पृथक कर दिया गया लेकिन सचिव भरत सिंह राजपूत आज भी पंचायत में कार्य कर रहा है। विभाग ने न तो उसे निलंबित किया न ही कोई अन्य कार्रवाई।
सोमवार, 4 फ़रवरी 2013
पंच परमेश्वर के बंधे हाथ
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Ditulis Oleh : Janprachar.com Hari: 10:27 pm Kategori:
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