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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

जिला पंचायत अध्यक्षों को लाल बत्ती की दरकार

रवि अवस्थी,भोपाल। मानदेय 11 हजार रुपए महीना और खर्चा 50 हजार से भी ज्यादा। पांच हजार रुपए रोज का तो लोग चाय-नाश्ता कर लेते हैं। इस पर जिले में दौरा करना हो तो डीजल-पेट्रोल का खर्चा अलग। इस पर अधिकार के नाम पर जीरो। एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का भी तबादला नहीं करवा सकते। अधिकारी तो फिर दूर की बात है। अधिकारविहीन होने से अफसर भी भाव  नहीं देते। यह पीड़ा है, प्रदेश के जिला पंचायतों के अध्यक्ष व उपाध्यक्षों की। जो कहने को जिले के ग्रामीण इलाकों के मुखिया हैं ,लेकिन इन्हें अपने वाहन पर लाल या पीली बत्ती लगाने का भी हक नहीं। 
 

प्रदेश की जिला पंचायतों के एक दर्जन से अधिक अध्यक्ष,उपाध्यक्षों का एक प्रतिनिधिमंडल हाल ही में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव से मिला। मांग रखी अधिकारों की।  इनमें प्रमुख यही कि प्रोटोकाल के मामले में उन्हें महापौर से ऊपर रखा जाए।  जिला पंचायत अध्यक्षों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें न तो तबादलों के  निर्देश देने के अधिकार हैं न वह कोई जांच बिठा सकते। मांगों की फेहरिस्त खासी लंबी है-मसलन ग्राम सभा जिला या जनपद पंचायत सदस्य की अध्यक्षता में संपन्न हो। मपं पंचायत राज अधिनियम की धारा सात के तहत संस्थाओं के कर्मचारियों पर अध्यक्ष का नियंत्रण रहे। जिला पंचायतों को जिले के ग्रामीण इलाकों में किए जाने वाले कार्यों का आडिट करने का अधिकार मिले।

 ग्राम सभा में पारित प्रस्तावों पर संज्ञान नहीं लेने वाले विभागों को धारा ८६ के तहत निर्देश देने के अधिकार रहे। सांसद,विधायकों की तरह जिला व जनपद पंचायत के सदस्यों को ग्राम पंचायत में सदस्य मनोनीत किया जाए। उन्हें योजना क ा क्रियान्वयन करवाने की बजाए अनुश्रवण या मूल्यांकन करने के अधिकार मिलें। प्रत्येक ग्राम सभा की वीडियो रिकार्डिंग करवाने के लिए समुचित बजट मुहैया कराया जाए। घोटाले या गड़बड़ी की स्थिति में पंचायतों का आडिट करने वाले पर भी कार्रवाई करने के अधिकार मिलें। जिलों में सभी विभागों के बजट आवंटन की पुरानी व्यवस्था फिर बहाल की जाए। ग्राम पंचायतों में अनुशासन व नियंत्रण रखने के लिए रेण्डम आधार पर तिमाही जांच की व्यवस्था हो। तय प्रशासनिक व्यय से अधिक व्यय होने की स्थिति में वसूली संबंधित अधिकारी से की जाए। ग्राम सभा द्वारा चयनित हितग्राही के  अनुमोदन का अधिकार जिला व जनपद पंचायतों को मिले।
  परफारमेंस ग्रांट की राशि अनाबद्ध की जाए ताकि जिला पंचायतें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप  राशि खर्च कर सकें। ऐसी व्यवस्था हो कि संबंधित विभाग प्रस्तावों का तय समय में पालन करें। पंचायतों में नियुक्तियों व हितग्राही चयन के अधिकार जिला पंचायत अध्यक्ष के नेतृत्व में चयन समिति बना कर इसे सौंपे जाए। संविदा कर्मचारियोंकी सेवावृद्धि या अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार  भी इसी समिति के पास हों। 
 जिला,जनपद व ग्राम पंचायतों को वीडियो कांफें्रसिंग सुविधा से जोड़ा जाए। पंचायत समन्वय अधिकारी से लेकर निचले स्तर तक के सभी कर्मचारियों के जिले में तबादले के अधिकार जिला पंचायत को मिले। अविवादित नामांतरण व बंटवारे के अधिकार पूर्व की तरह  पुन: ग्राम पंचायतों को सौंपे जाएं। निर्माण व दीगर कार्यों के  लिए खरीदी राज्य शासन द्वारा तय एजेंसी से न होकर सीधे बाजार से खरीदने के अधिकार मिलें। 
न हो कुटिल व्यवस्था
 जिला पंचायत अध्यक्षों ने साफ तौर पर कहा कि  मंत्री या राज्य मंत्री क ा दर्जा प्राप्त की कुटिल व्यवस्था को समाप्त कर उन्हें राज्यमंत्री क ो दिए जाने वाले प्रोटोकाल प्रदान किया जाए। प्रोटोकाल में वे महापौर से ऊपर हों। जिले में या इससे बाहर भ्रमण के दौरान उन्हें लाल बत्ती ,उपाध्यक्ष को पीली बत्ती व सुरक्षा के तौर पर बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी मुहैया कराया जाए। 
'दुधारू  गाय' बनी मिड-डे मील व्यवस्था में क्रियान्वयन व सीधे हस्तक्षेप के अधिकार जिला व जनपद पंचायतों को मिले। कालोनाइजर एक्ट के तहत फीस वसूलने व अनुमति देने में जिला पंचायतों की प्रभावी भूमिका रहे। जिले की आंगनवाड़ियों पर भी जिला व जनपद पंचायतों का सीधा नियंत्रण हो। पंचायतों के प्रतिनिधियों का मानदेय इतना हो कि वे जीवन यापन व सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें।  जिला पंचायतोें के निर्वाचित व्यक्ति को ही विहित प्राधिकारी यानी न्यायालयीन अधिकार प्रदान किए जाएं। जनपद एवं जिला पंचायत अध्यक्ष को एक कम्प्यूटर व इसे चलाने के लिए आपरेटर प्रदान किया जाए। 
सत्ता के  केन्द्रीयकरण से बढ़ा असंतोष
 त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को लेकर पूर्ववर्ती कांग्रेस व मौजूदा भाजपा शासनकाल में एक बड़ा फर्क है। लंबे अर्से के बाद यह व्यवस्था तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार के  कार्यकाल में प्रभावी तरीके से लागू की गई। तब सत्ता का विकेन्द्रीयकरण करते हुए जिला व जनपद पंचायतों को अधिक अधिकार संपन्न बनाया गया था। मसलन,संविदा शिक्षकों की भर्ती तक करने के अधिकार जिला व जनपद पंचायतों को थे। 
  अविवादित नामांतरण व बंटवारे के अधिकार पंचायतों के पास थे। विभिन्न विभागों का बजट जिला पंचायतों के माध्यम से विभागों तक पहुंचता था। हालांकि इस व्यवस्था के  कुछ दुष्परिणाम भी रहे। 
 जिला व जनपद पंचायतों के पदाधिकारी व अधिकारी काफी संपन्न हुए,लेकिन संगठन स्तर पर मैदानी राजनेताओं व कार्यकर्ता में असंतोष नहीं था। साफ तौर पर कहा जाए तो जिलों का भ्रष्टाचार जिलों तक ही सीमित था और राजधानी का राजधानी तक। 
  राज्य का एक जिला तो ऐसा रहा जहां समानान्तर सत्ता चली। मैदानी स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ा तो विकास कार्य  केवल कागजों तक सिमट कर रह गए। सड़कें गड्डों में तब्दील हो गई और गांव के साथ शहर भी अंधेरे में डूब गए। चरनोई की जमीन का बंटवारा होने से वर्ग संघर्ष के हालात बन गए। इसका खामियाजा कांग्रेस को अब तक भुगतना पड़ रहा है।
  भाजपा शासनकाल में व्यवस्था का एक बार फिर केंद्रीयकरण हो गया। जिला पंचायतों कोषालय की बजाए केवल निगरानी करने वाली एक एजेंसी बन कर रह गई। जनपद व ग्राम पंचायतों की व्यवस्था में भी कसावट पैदा हुई। आलम यह कि  सरपंच अब पंचायत बजट के नाम पर सौ रुपए नकद खर्च करने की स्थिति में भी नहीं।  
 जिलों में व्यवस्था पर नियंत्रण के लिए  प्रभारी मंत्री को जबावदेह बनाया गया। यह अलग बात है कि यह जबावदेही केवल कागजों तक सीमित रही। समुचित नियंत्रण नहीं होने से मैदानी स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला।  इस व्यवस्था में अधिकारी अधिक संपन्न व सक्षम हुए। जनप्रतिनिधियों में असंतोष बढ़ा तो अधिकारी,कर्मचारियों की तिजौरियां छापे के दौरान करोड़ों की रक म उगलने लगी। इस केंद्रीयकृत व्यवस्था में  व्यापमं महाघोटाले जैसे मामले सामने आए तो कई वरिष्ठ अधिकारियों क ा असली चेहरा सामने आ गया। बहरहाल,एक बार फिर सत्ता के विकेंद्रीयकरण को लेकर जिला पंचायतों के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष लामबंद हैं और वे जिलों की समूची व्यवस्था  को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। 
महापंचायत की तैयारी
 जिला व जनपद पंचायतों के पदाधिकारी अपने अधिकारों को लेकर एकजुट हैं। उन्होंने मन बना लिया है कि यदि उनकी सुनवाई नहीं हुई तो गांधी जयंती पर पचमढ़ी में एक महापंचायत बुला कर आंदोलन का शंखनाद किया जाए। देवास जिला पंचायत के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं, यूं तो मुख्यमंत्री श्री चौहान ने उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया है। पंचायत मंत्री भी उनकी मांगों से सैद्धांतिक तौर पर सहमत हैं। इस पर भी बात नहीं बनीं तो अब जो महापंचायत तय करेगी। उस पर आगे अमल किया जाएगा।
    श्री राजपूत ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि मानदेय केवल ११ हजार रूपए मासिक है। यानी एक दिन के चार सौ रुपए भी नहीं। जबकि चार-पांच हजार रुपए रोज के तो  मिलने आने वाले लोगों के सत्कार पर खर्च हो जाते हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष हूं तो लोगों की अपेक्षाएं भी काफी हैं। जिले में घूमने पर वाहन में डीजल भी खुद की जेब से ही डलवाना पड़ता है। अब अपना घर फूंक कर अध्यक्षी करना पड़े तो इससे तो घर बैठना ज्यादा अच्छा है। कमोवेश यही प्रतिक्रिया अन्य जिला पंचायत अध्यक्षों की भी रही। 
 पंचायत प्रतिनिधियों का मासिक मानदेय 
 जिला पंचायत अध्यक्ष    11 हजार
  जिला पंचायत उपाध्यक्ष  9500
  जिला पंचायत सदस्य    4500
 जनपद अध्यक्ष            6500
   जनपद उपाध्यक्ष        4500
  जनपद सदस्य           1500
   सरपंच                   1750
    पंच     अधिकतम       600
महापौर को सीधे जनता चुनती है
इधर,पंचायत विभाग ने साफ तौर पर कहा है कि जिला पंचायतों के अध्यक्ष को प्रोटोकॉल में महापौर से ऊपर नहीं माना जा सकता। महापौर सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं जबकि जिला पंचायत अध्यक्षों का निर्वाचन सदस्यों द्वारा किया जाता है। इसी तरह योजनाओं का अनुमोदन जिला पंचायत की साधारण सभा में होता है, जिसके पदाधिकारी सदस्य होते हैं। जब सभा में अनुमोदन हो गया तो नस्तियां अध्यक्ष,उपाध्यक्ष के पास क्यों आएंगी। जिले में तृतीय और चतुर्थ वर्ग कर्मचारियों के तबादले प्रभारी मंत्री के अनुमोदन से होते हैं।  
  अंतर विभागीय मामलों में निर्णय लेने का अधिकार मंत्री को भी नहीं है। जहां तक सवाल प्रोटोकाल में वाहनों पर बत्तियों व सुरक्षा की मांग का है तो यह प्रस्ताव सामान्य प्रशासन  विभाग को भेज दिया गया है। अब यह शासन को तय करना है। इसी तरह अविवादित नामांतरण व बंंटवारे का काम पंचायतों के अधीन किए जाने संबंधी मांग का प्रस्ताव भी राजस्व विभाग को भेज दिया गया है। पूर्व  में यह व्यवस्था लागू थी,लेकिन अव्यवस्था पैदा होने पर राजस्व विभाग ने इस वापस ले लिया था। न्यायालयीन अधिकार को लेकर विभाग ने कहा कि प्रभारी मंत्री या जिला पंचायत अध्यक्ष न्यायालय की परिभाषा में नहीं आते। केवल घोषित राजस्व न्यायालय को ही विहित प्राधिकारी घोषित किया गया है।
   उन्हें विधि अनुसार शक्तियां प्राप्त हैं। क म्प्यूटर व आपरेटर की व्यवस्था के लिए संबंधित जिला पंचाायतों के  सीईओ को पहले ही मार्गदर्शन दिया जा चुका है। मानदेय में बढ़ोत्तरी दो साल पहले ही की गई। हितग्राही मूलक सभी योजनाओं में हितग्राही चयन के  अधिकार ग्राम सभाओं को है। विभागीय चयन समितियां विभागीय प्रशासकीय निर्देशोंके तहत गठित हैं। विभिन्न संवर्गों के संविदा शिक्षकों की नियुक्ति संबंधी कार्यवाही जिला पंचायत व जनपद पंचायत की सामान्य प्रशासन समिति द्वारा की जाती है। पंचायत समन्वय अधिकारी का पद राज्य काडर का होने से इनका स्थानांतरण राज्य स्तर से ही किए जाने का प्रावधान है। 
अब महापंचायत में उठाएंगे मुद्दे
पंचायत विभाग भले ही जिला व जनपद पंचायतों के पदाधिकारियों को उनके द्वारा चाही गई सहूलियतें देने को राजी न हो लेकिन यह पदाधिकारी अपनी मांग पर अटल हैं। मांगों को पूरा करवान बनाए जा रहे दबाव के मद्देनजर संगठन के मार्फत जिला पंचायत अध्यक्ष व उपाध्यक्षों का सम्मेलन दो सितंबर को पचमढ़ी में बुलाया जा रहा है। इसमें 41 जिला अध्यक्ष और 33 उपाध्यक्ष शिरकत करेंगे, जबकि मांगें सभी पदाधिकारियों की हैं। सितंबर तक मांगें पूरी नहीं हुई तो दो अक्टूबर को भोपाल में महापंचायत होगी। ​​

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