रवि अवस्थी,भोपाल। मंत्री,वैद्य और गुरु ही यदि झूठी ठकुरसुहाती पर उतर आएं तो ‘राज्य’ पर खतरा मंडराना तय है। बीते बजट सत्र के दौरान राज्य विधानसभा में सूबे के कुछ मंत्रियों ने अपने नंबर बढ़वाने के लिए जिस तरह का आचरण किया वह महाकवि तुलसीदास की उक्त चेतावनी को नजरअंदाज करने वाला ही था। यदि यह कहा जाए ,कि अपने मंत्रिमंडल के कुछ सहयोगियों की गलत सलाह के चलते शिवराज सरकार एक बार सांसत में है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगा।
विपक्ष के हमले से घबरा कर राज्य सरकार द्वारा आनन-फानन में राज्य विधानसभा का बजट सत्र का तय अवधि से 27 दिन पहले समाप्त कराना और सत्र समापन की हड़बड़ी भी ऐसी ,कि अगले दो-तीन माह सरकार चलाने के लिए जरूरी अनुपूरक बजट पारित कराना भी याद नहीं रहा । अब इस बजट को पारित कराने के लिए विधानसभा का संक्षिप्त सत्र पुन: आहूत करने के लिए प्रयास करना। बारह साल तक लगातार सत्ता में रहने वाली एक मजबूत व स्थायी सरकार से तो इस तरह की कार्यशैली की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती,लेकिन जो हुआ वह सर्वविदित है।
बजट सत्र के सातवें दिन शिवराज सरकार मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने अपने नंबर बढ़वाने के लिए जो आचरण किया,वह तो यही दर्शाता है। संसदीय कार्यमंत्री जिनका दायित्व सदन को सुचारू रूप से चलाने का है,वही सत्रावसान के लिए माहौल पैदा करने अपने साथी सदस्यों को उकसाते दिखे। अतिउत्साह में वह आसंदी को धमकाने से भी नहीं चूके,हालांकि अपने आचरण के लिए बाद में उन्हें विधानसभा अध्यक्ष से खेद प्रकट करना पड़ा।
यह अनुभवहीनता पिछले कार्यकाल में भी दो बार सरकार को मुसीबत में डाल चुकी है। पहली तब जब विपक्ष के दो सदस्यों की बर्खास्तगी और दूसरे ही दिन बहाली हुई दूसरी बार जब अविश्वास प्रस्ताव आया। एक बार फिर इसकी पुनरावृत्ति होना कहीं न कहीं इस बात का द्योतक है,कि सरकार ने पिछली गल्तियों से सबक नहीं सीखा। बजट सत्र समापन के पीछे तर्क यह दिया गया,कि विपक्ष एक ही मुद्दे को लेकर सदन की कार्रवाई को लगातार बाधित करते रहा है। तब इस बात की क्या गारंटी है,कि दिनोंदिन विराट स्वरूप अख्तियार करते जा रहे व्यापमं के मुद्दे को लेकर विपक्ष सरकार को आगे नहीं घेरेगा? तो क्या उसके हंगामे के भय से विधानसभा के सत्र ही नहीं बुलाए जाएंगे? लोकतांत्रिक प्रक्रिया व संवैधानिक दृष्टि से न तो यह संभव है,न इसके कोई आसार हैं।
यही नहीं, बजट सत्र के मामले में किरकिरी करा चुकी राज्य सरकार ने इसी बीच एक कदम और उठाया। यह है, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी व कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज करने का है। करीब डेढ़ से दो दशक पूर्व राज्य विधानसभा में हुई इन भर्तियों को लेकर भाजपा सरकार ने एक जांच कमेटी गठित की थी। इसकी रिपोर्ट आए हुए ही एक अरसा बीत चुका है। करीब एक दशक पुरानी इस रिपोर्ट पर आज उस वक्त कार्रवाई करना ,जब सरकार स्वयं व्यापमं के भर्ती घोटाले मामले में घिरी हो। प्रथम दृष्टया ही यह बदले की भावना से उठाया गया कदम प्रतीत होता है।
बीते एक दशक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली एक सहज व सरल राजनेता की रही है। द्वेषता या बदले की भावना से कार्रवाई करना न उनका स्वभाव रहा न उनके संस्कार ऐसे हैं। तब क्या यह माना जाए,कि बीते घटनाक्रम किसी गलत सलाह या उकसावे में आकर की गई कार्रवाई का नतीजा है। इस मामले में भी राज्य सरकार यह भूल गई,कि बीते एक दशक के दौरान भी राज्य विधानसभा सचिवालय में भर्तियों को लेकर किसी आदर्श आचार संहिता का पालन नहीं किया गया। गड़बड़ियां इस दौरान भी हुईं और यह सिलसिला जारी है। उनके अपनों के कारनामें भी कुछ कम नहीं रहे। करीब साल भर पहले व्यापमं का सच शीर्षक से एक पुस्तक का प्रकाशन कर सत्तारुढ़ दल भाजपा खुद ही इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है और फिर हाथ-कंगन को आरसी क्या?
एक राजनैतिक दल विशेष के प्रेस नोट बांटने वाले हों या बंगलों पर काम करने वाले नौकर। ऐसे दर्जनों लोग हैं,जिनकी तनख्वाह शासकीय कोष से आहरित हो रही है और काम वे पार्टी विशेष का कर रहे हैं। कहावत भी है,कि जिसके अपने घर शीशे के हों वे दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते। अब बात निकली है तो इसका दूर तलक जाना तय है। हुआ भी यही,राज्य में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं ने राज्य विधानसभा में बीते एक दशक के दौरान हुई भर्तियों को लेकर मोर्चा खोल दिया। सूत्रों के मुताबिक, विधानसभा भर्ती का यह मामला उछलवाने में विस सचिवालय के ही एक वरिष्ठ अधिकारी की अहम भूमिका है। इसके बहाने न उन्होंने अपने विरोधियों पर निशाना साधा बल्कि अपने नंबर बढ़वा कर अपना सेवाकाल बढ़वाने की तैयारी कर ली।
अपने बचाव की बजाए विरोधियों पर बदले की भावना से कार्रवाई करना राजनीति में सफल नहीं माना गया है। यह एक प्रकार से नई मुसीबत को जन्म देने जैसा है। राज्य सरकार ने यह जोखिम लेकर एक नया दांव खेला है। उसने न केवल कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के खिलाफ अपराधिक प्रकरण कायम कराया बल्कि पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ,नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे व कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता केके मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई के संकेत देकर समूची प्रदेश कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश की है। हालांकि श्री सिंधिया के खिलाफ कार्रवाई होने की स्थिति में इसी घराने से संबंद्ध उनके अपनों के भी प्रभावित होने के आसार हैं। यही कमजोर कड़ी सरकार के लिए अब तक हिचकिचाहट का कारण बनी है।
देर-सबेर ऐसा हुआ तो कांग्रेसी नेताओं में बौखलाहट आना तय है। दो वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ दर्ज हुए प्रकरण ने गुटों में बंटे कांग्रेस के नेताओं को एक कर दिया है। अपने बयानों से प्रदेश सरकार के लिए जब-तब मुसीबत खड़ी करते रहे कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ,सरकार के खिलाफ खुल कर सामने आ गए हैं। उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज हुए प्रकरण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को चेतावनी दी,कि उसमें यदि साहस है तो वह व्यापमं व विधानसभा के भर्ती घोटाले मामले की जांच सीबीआई को सौंप दे।
श्री सिंह जानते हैं,कि व्यापमं के जिन्न से पहले ही घबराई शिवराज सरकार यह जोखिम कभी नहीं उठाएगी। सरकार के इस कदम से राजनैतिक हल्कों में यह भी चर्चा है,कि सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम प्रदेश की राजनीति में वैमनस्यता को ही बढ़ावा मिलेगा। देर से ही सही,लेकिन इसका नुकसान भाजपा को ही होगा,क्योंकि प्रदेश कांग्रेस के पास खोने को यूं भी कुछ खास नहीं है।

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